Wednesday, 27 February 2019


"जिस दिन जहन आज़ाद हो जाएगा-मनुवाद और ब्रह्मंवादियो की दुकाने बंद हो जाएगी.."
शरीर की गुलामी से आसानी से मुक्ति मिल जाती हे..
लेकिन मानसिक गुलामी से आज़ाद होने में सदियाँ लगती है....
ब्राह्मणवादी एवं मनुवादियों की संख्या गिनती की हे...
पर उन्हें समर्थन करने वाले और पोषक तत्वों की संख्या अनगिनत हे...
और यह एक कडवा सच हे की 80% मूलनिवासी(दलित-आदिवासी-पिछड़े) आज भी मानसिक रूप से मनुवादियों के गुलाम हैं..
इश्वर-भय से कर्मकांड-पाखण्ड-कुरीतियों-शकुन-अपशकुन आदि करने में सबसे आगे हम ही हैं...
क्या वजह हे की मनुवाद-ब्राह्मणवाद की दुकाने आज भी चल रही हे..
मंदिरों-मस्जिदों-गिरिजाघरो की संख्या बढ़ी ही हे घटी नहीं...
कोर्पोरेट कंपनियों की तरह मंदिरों-मस्जिदों का भी सालाना टर्नओवर निकलने लगा हे..
चढ़ावे के नाम पे काला धन सफ़ेद में बदला जा रहा हे....
और इश्वर के दलाल फल फूल रहे हैं... मनुवाद का कद बढ़ ही रहा हे...
इसका सिर्फ और सिर्फ एक कारण हे....
हम आज भी मानसिक गुलाम हैं.. सामाजिक बेड़ियाँ तोड़ दी गयी हैं...
पर जहन आज भी उन बेड़ियों में जकड़ा हुआ हे...
इश्वर-भय लाजमी हे.. पर उसके निवारण के लिए कर्मकांड का सहारा लेना मूर्खता हे..
आपके हाथ-पैर, आपका समाज काफी हद तक आज़ाद हे...
बस जरुरत हे तो अपनी सोच-अपने जहन को आज़ाद करने की....
भगवन के डर से बचने के लिए पाखण्ड-कर्मकांड का सहारा न लेने की...
जिस दिन जहन आज़ाद हो जाएगा-मनुवाद और ब्रह्मंवादियो की दुकाने बंद हो जाएगी..

अगर लक्ष्मी पूजा करने से धन का आगमान होता या सुख शांति मिलती तो ........ भारत देश को विदेशों से अरबों का उधार लेने की जरुरत नहीं पड़ती और भारत में ८०% जनता की कमाई केवल २० रुपया रोज यानी ६०० रूपया महीना है (हमारा मोबाइल या इलेक्ट्रिक का बिल भी इससे कई ज्यादा होता है)...
दुनिया का सबसे आमिर आदमी बिल गेट्स ने कभी लक्ष्मी की पूजा नहीं की ........ जगत के बिलिन्नेयार्स को लक्ष्मी नाम की देवता भी पता नहीं...
अमेरिका देश मात्र जीसस की पूजा करता है, और वहा गरीबी का पता नहीं (Per Capita Income). वहां के गरीब हमारे अमीरों में गिने जायेंग.......
अरेबियन देश के लोग मात्र अल्लाह की पूजा करते है, जगत के श्रेष्ठ अमीरों में कुछ की गिनती होती है.........
जापान चायना में मात्र बुद्ध की पूजा होती है और सारे लोग आमिर है......
लेकिन लक्ष्मी की सालों से पूजा करने वाले भारत की गरीबी अफ्रीका के कुछ देशों से भी बदतर है...
कड़वा सच ।।
धन की देवी लक्ष्मी की पूजा सिर्फ हमारे देश मे की जाती है,फिर भी देश की 75% जनता गरीबी और भुखमरी से लड़ रही है।।
शिक्षा की देवी सरस्वती की पूजा भी सिर्फ हमारे ही देश मे कि जाती है ।।फिर भी हमारे देश की गिनती सबसे अनपड़ देशो मे होती है।।
अन्न उत्पादन करने कि देवी अन्नपुर्णा की पूजा भी सिर्फ हमारे देश मेँ होती है।।फिर भी हमारे देश के हजारोँ गरीब किसान हर साल अत्महत्या कर लेते है ।।
बारीश के देवता इन्द्र की पूजा भी सिर्फ हमारे ही देश मेँ होती है।।फिर भी कभी सुखा तो कभी बाढ आ जाती है ।।
औरत को हमारे यहाँ देवी का दर्जा दिया जाता है ।।फिर भी दहेज के लिये हर साल हजारो औरतोँ को जिन्दा जला दिया जाता है कन्या भ्रूण हत्या के मामले मेँ अग्रणी देश है भारत।।
अतिथि देवो भवः अतिथि को भगवान माना जाता है ।।फिर भी अक्सर विदेश से आये अतिथियोँ की हत्या या बलात्कार होना हमारे यहाँ आम बात है ।।
नटखट कृष्ण की पूजा भी हमारे ही यहाँ होती है,तो क्या इसी लिये सबसे ज्यादा लड़कियो से छेड़छाड़ और बलात्कार हमारे यहाँ होते है ???
अप्प दिपो भव: अब तो मूर्खता का दामन छोड़ो
ऐसा क्यों ?
कोई भी देश या उस देश का व्यक्ति आमिर या गरीब, किसी भगवान् की पूजा करने से नहीं होता बल्कि उस देश की अर्थ निति और सबको समान संधि उब्लब्ध करने की निति से होता है...
पंसद आये तो सेयर जरुर करे
"मीर महमंद" शिवकालीन चित्रकारानेआपल्यावर
फार मोठे उपकार केलेत....मनुची या इटालीयन
प्रवाशाच्या पुस्तकांतमीर महमंद
या मुसलमानचीत्रकाराने काढलेलेचित्र आहे. हे
चित्र इ.स.१६६५ च्या आसपासकाढलेले असून हे
शिवाजीमहाराजाचेएकमेवअस्सल चित्र ओळखले
जाते .या चित्रात एकूण ३१ अंगरक्षक व शिपाई
आहेतत्यापैकी ७ अंगरक्षकांना अर्धवट तर
१३अंगरक्षकांना भरपूर दाढी-
मिशा आहेत.पेहरावावरून व चेहरेपटीवरून हे
वीसजण मुसलमानअसल्याचेठळकपणे लक्षात
येते . यावरूनशिवरायांच्या सैनिकांत असलेले
मुसलमानसैनिकांचे प्राबल्य लक्षात
येते.शिवाजीराजांची लढाई आदिलशहा,
मुघल,सिद्दी, पोर्तुगीज यांच्याविरुद्ध
होती;ती राजकीय लढाई होती. धार्मिक लढाई
नव्हती.शिवरायाचे पहिले चित्र रेखाटणारा मीर
महंमदहा मुस्लिमच होता. असे असंख्य
मुस्लिमशिवरायांकडे होते. म्हणजे
शिवाजीमहाराजधर्मनिरपेक्ष म्हणजेच
समता,मानवतावादीहोते. शिवचरित्रातून
मानवतावादशिकता येतो.छत्रपतीच्या काळात
असे अनेकनिष्ठावंतमुस्लीम सैनिक होते
ज्याची माहिती आपणासज्ञात नाही हे
लिहिण्याचे प्रयोजनएवढ्याचसाठी की आपण
छत्रपती शिवराय
वछत्रपती संभाजीराजेंना धर्माच्या बंधनात,भाषेच्या
बंधनात अडकवून,या राष्ट्रपुरूषांचे महत्व
कमी करू नये. छत्रपतींचे विचार आपणआचरणात
आणावेत.मित्र-मैत्रीनेनो मग
आपणचसांगा असा धार्मिकसाहिष्णू
ता असलेला राजा मुसलमानविरोधी कसा ??

Wednesday, 30 January 2019

हळदी कुंकू.......

मानसिक गुलामगिरी शारीरिक गुलाम गिरीपेक्षा अधिक घातक असते. कारण त्यात आपण  गुलाम असल्याची  जानीवच होत नाही .म्हणूनच  परंपरेनी  बहाल केलेल्या  सणवारांची  चिकित्सा  न करता त्यांना रहाटगाड्यासारखे  सुरू ठेवल्यास  मानसिक गुलामगिरीचा  विळखा अधिकाधिक  घटट् होत जातो.
    हळदी कुंकवाच्या  निमित्ताने स्त्रियांनचे स्नेहवादी मिलनाचा परंपरा हे असेच लोढणे होय. मुजोर गायी बैलाच्या गळ्यातही गाव खेड्यात लाकडी ओंडक्याचे लोढणे बांधतात. परंतू ते ओझेरूपी  लोडणे लवकर  सोडता येते. मात्र स्त्रियांच्या स्त्रियांच्या मेंदूत भिनलेले खूळचट परंपरांचे लोढणे  निघाल्या शिवाय स्त्रिया स्वसन्मानाची भाषा बिलकूल करणार नाही .

हळदीकुंकू  म्हणजे  काय तर परस्परांच्या सौभाग्याला दिर्घायुष्य चिंतणे. आपल्या  बायकोचे आयुष्य वाढावे म्हणजेच ती दीर्घायुष्य व्हावी अशी कामना करायला लावणारा एकतरी सणवार या संस्कृतीत  आहे काय . नाही ना कारण त्याची पुरूषाला गरजच नाही. हे कोणी शिकवले संस्कृतीने  अशा संस्कृतीत वाढणारी म्हणूनच विज्ञानाचे शिक्षण घेऊनही  अविचारी ,रूढींवादी व स्त्रिविरोधी पुरूषी मानसिकता  तयार होते.
      म्हणूनच भाऊ हा पुरुष आपल्या बहिणीच्या नवऱ्यासाठी व बाप हा पुरुष आपल्या मुलीच्या नवऱ्यासाठी  जावयासाठी  हुंड्याची व्यवस्था करतो. हि खरेदीविक्री कोणाची होते तर  एका स्त्रीची .याचा विचार कोणताही बाप  भाऊ करीत नाही. त्यामुळे बिनबुडाच्या लोटयासारखी  स्त्रीची  अवस्था आहे. म्हणूनच तर तिचे दान केले जाते. आणि पुरुष दानशूर बनतो.
    हळदीकुंकू हे नुसतेच हळदीकुंकू नाहीतर  सांस्कृतिक गु्लामीची खरुज आहे. जिचा प्रसार प्रचार  मकरसंक्रांतीला व्यापक स्तरावर केला जातो. पण त्या खरुजेचेही जतन स्त्रिया केवळ यासाठी भक्ती भावाने करतात कारण त्याचा संबध धर्माच्या परंपरांशी लावला जातो . पण खुळचट परंपरांचा त्याग आणि परंपरांची निर्मिती ही प्रक्रिया सुरु केल्याशिवाय स्त्रियांमध्ये मेंदू नावाचा अवयव आहे असे म्हणता येणार नाही.  धर्माच्या नावावर जर स्त्री विरोधी परंपरांचा धिक्कार स्त्रिया करणार नसतील तर  नुसतीच सावित्रीमाईंची जयंती साजरी करून काय फायदा. त्यापेक्षा तर सत्यवान सावित्रीचा आदर्श घेणे चांगले. 
     परंतु तसाच एखादा तरी सत्यवान या परंपरेनी  का निर्माण होवू दिला नाही जो आपल्या बायकोसाठी एवढा व्याकूळ होतो.  दुसऱ्याच्या सांगण्यावरून  आपल्या बायकोला त्यागणारा पुरुषोत्तमही देव ठरून पुजनीय मानला जातो .तेही कमी ठरेल की काय  स्त्रियांचे कपडे पळवून त्यांना कपडे परत करण्याविषयी  विचार करायला लावणारा स्त्रीलंपट  देवपुरुष महान ठरतो. अर्थात पुरुषांनी आपल्या स्वार्थाखातर हे केले ,आणी स्त्रिया आजही नवर्याला देव मानतात दुर्दैवाने.

Sunday, 13 January 2019

महाराष्ट्र में गुडीपाडवा त्यौहार का सच!

गुडीपाडवा ये त्यौहार महाराष्ट्र में खासकर मनाया जाता है। लेकिन बहोत सारे मूलनिवासी, शुद्र मराठा समाज ने अब तक इसके पीछे का इतिहास जानने की कभी कोशिश नहीं कि। हालाकि संभाजी ब्रिगेड ने सच्चा इतिहास ब...ताने का काम शुरू किया है। लेकीन अभी भी बहोत सारे लोगों को इसका ज्ञान नहीं है।

गुडीपाडवा के दिन शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज को ब्राह्मणों ने औरंगजेब को धोका करके पकड़ के दिया था और उनको मनुस्मृति के अनुसार सजा दी गयी थि। ब्राह्मणों ने उनका सर काटके भाले पे लटकाया गया और उसका जुलूस निकाला क्यों की उन्होंने बुद्ध भूषण नाम का ग्रन्थ बहोत कम उम्र में लिखा था और ब्राह्मणों की दादागिरी को ललकारा था। बहोत सारे ब्राह्मण चोरो को भी उन्होंने पकडवाके संभाजी महाराज ने सजा भी दि। इसका बदला लेने के लिए ब्रह्मनोने संभाजी महाराज की बदनामी की और उनको धोके से मार डाला, वो आज ही के दिन, गुडीपाडवा ! कह जाता है के ये त्यौहार श्री राम अयोध्या वापिस आने पर उनके स्वागत के लिए मनाया जाता है, लेकिन जहा श्री राम वापस आया था उस अयोध्या नगरी में तो कोई गुडीपाडवा ये उत्सव नहीं मनाता? तो फिर महाराष्ट्र में ही क्यों? क्या मराठा समाज को ये विचार कभी आया है?

जब मराठा लोग एक दूसरों को गुडीपाडवा दिन की बधाई देते है तो हमें बड़ा दुःख होता है और उनके अज्ञान पर बड़ा तरस आता है।
औरंगजेब ने संभाजी महाराज कि तऱ्ह आज तक किसी कि भी हत्या नाही कि थी ! महाराज को सरल तरीके से मारणे के बजाय अलग-अलग दंड क्यो दिया? सबसे पहले महाराज कि जीवा काटी गयी ! इससे अनुमान लागाया जा सकता है कि संभाजी महाराज ने संस्कृत भाषा पर प्रभुत्व हासिल किया था ! उन्होने चार ग्रंथो कि रचना कि थी, इसलिये सबसे पहले उनकी जीवा काटने कि ब्राह्मनोने सलाह दि थी ! उसके बाद महाराज के कान,नाक आंखे और चमडी निकाली गयी ! यह घीनौना दंड "मनुस्मृती" संहिता के अनुसार दिया गया !
मतलब औरंगजेब के माध्यम से ब्राह्मनोने संभाजी महाराज को यह दंड दिया ! कवी कुलेश को भी औरंगजेब ने जिंदा नाही छोडा ! क्योंकी अपनी जान से भी ज्यादा चाहनेवाले संभाजी महाराज जैसे स्वाभिमानी ,निर्मल और चाहिते दोस्त के साथ यदि कुलेश गद्दारी कर सकता है,तो वह हमारे साथ भी गद्दारी कर सकता है,इस बात को सोचते हुये औरंगजेब ने कुलेश कि भी जान ले ली ! औरंगजेब ने अपने सगे भाई तथा चाहिते सरदार दिलेरखान ,मिर्झाराजे ,जयसिंग इन वफादार सर्दारो को भी मार डाला ! इसलिये मदत करनेवाले कवी कुलेश को जिंदा रखना औरंगजेब को संभाव नहि था ! क्योंकी औरंगजेब ने कवी कुलेश को उसके काम कि पुरी किमत अदा कि थी !
औरंगजेब ने संभाजी महाराज को धर्मद्वेष के कारण नहि मारा बल्की राजनीतिक संघर्ष कि वजह से मारा ! औरंगजेब ने संभाजी महाराज को केवळ दो सवाल पूछे ! पहला सवाल ,'आपके खजाने कि चाबिया कहा है? ' और दुसरा सवाल था ,'हमारे सर्दारो मे आपकी मुख् बिरी करणेवाला सरदार कौन है?' इसका मतलब औरंगजेब ने संभाजी महाराज को धर्मांतरण करणे का आग्रह नाही किया और ना हि संभाजी महाराज ने इसके बदले मे औरंगजेब के सामने उसकी लडकी कि मांग रखी ! संभाजी महाराज कि हत्या के पाश्च्यात ब्राह्मनोने जल्लोष के तौर पर " गुडीपाडवा ' शुरू किया 

Sunday, 23 December 2018

शिवाजी महाराजांची तलवार

छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या ८ प्रमुख तलवारी होत्या,त्यातील सर्वात महत्वाची तलवार फिरंगी किवा भवानी तलवार जी सध्या रोयाल ब्रिटीश संघ्रलाय इंग्लंड मध्ये आहे.
शिवाजी महाराजांनी फिरंगी तलवार उर्फ भवानी तलवार portuguese ...व्यापार्यांकडून विकत घेतली होती.असा म्हंटल्या जाते नंतर शिवरायांनी भवानी मातेसमोर त्या तलवारीची प्रतीस्तापणा केली आणि त्या ताल्वारीमध्ये तोडासा बदल करून तिचे नाव भवानी तलवार ठेवले.
फिरंगी तलवार उर्फ भवानी तलवार ३५ ते ३८ इंची लामब असते ,फिरंगी तलवारला single sided किवा double sided धार असते.व तलवारीची मुठ स्टील ची असते.शिवरायांनी फिरंगी तलवार मध्ये काही बद्दल देखील केले,ते म्हणजे तलवारीच्या मुठीमध्ये कापुसाची गाधी भरली जेणेकरून ती सैनिकांना घाम आल्यावर तलवार हातातून निसटणार नाही.
काही दैववाद करणाऱ्या इतिहासकारांनी असे सांगितले आहे कि शिवरायांना भवानी तलवार स्वयं भवानी मातेने प्रगट होऊन दिले आहे.
जर भवानी मातेने शिवाजी महाराजांना भवानी तलवार दिली तर मग त्याच प्रकारची तलवार शाहजहान ह्या मुस्लीम शासकाकडे व बाजीराव पेशव्याकडे कोठून आली,शाहजहान आणि बाजीराव पेशव्याला पण भवानी माता प्रसन्ना झाली होती का?
सध्या फ्रेंच इतिहासकार फ्रान्सीस gouitier ह्या फ्रेंच इतिहासकाराने भवानी माता शिवरायांना तलवार देतांनाचा पुतळा बनवला आहे,अश्या स्वरूपाचे पुतळे उभारून आपण जिजामाता व शिवरायांचे कर्तुत्व नाकारत आहोत का?
ज्या शिवरायांनी मंगठीच्या झोरावर स्वराज्य निर्माण केले त्याला दैव वादाचे रूप देणे योग्य आहे का?शिवरायांना देवी प्रसन्ना झाली म्हणून ते स्वराज्य निर्माण करू शकले असा प्रचार करणे योग्य आहे का?
ज्या प्रकारे राम आणि कृष्ण ह्यांना विष्णूचा अवतार घोषित करून त्यांचा वापर दान आणि दक्षिणा मिळवण्यासाठी भटांनी केला तसाच प्रकारे मराठा साम्राज्याचा बाबतीत भाकड कथा रचणे योग्य का?छत्रपती शिवाजी महाराजांना भवानी मातेने स्वतः प्रगट होऊन तलवार दिली होती आणि त्याच तलवारीला भवानी तलवार म्हणतात असा अपप्रचार देशभरात करण्यात आलेला आहे.काही इतिहास्कारांनीच असा अपप्रचार केलेला आहे.छ.शिवाजी महाराजांचे कर्तुत्व लोकांपर्यंत पोहोचूनही अशा या अपप्रचाराने कर्तुत्वप्रधान महाराष्ट्रिय समाज दैववादी बनून बसला आणि महाराजांना भवानी मातेचा आशीर्वाद होता म्हणूनच ते इतके पराक्रम करू शकले आणि संकटातून नेहमी वाचत राहिले असाच विचार समाजमनात पेरला गेला.चांगल्या नशिबाशिवाय काहीच करता येत नाही असे लोक समजू लागले.या इतिहासकारांनी असा प्रचार का केला हे त्यांनाच माहित असेल.त्यांनी असे चुकून केले असे समजायला आपण काही मूर्ख नाही कारण सावंतवाडी जवळील कुडाळ नावाच्या गावातून एका पोर्तुगीज व्यापाऱ्याकडून ३०० होण (१०५० रुपये) रोख देऊन ही तलवार विकत घेतल्याची नोंद महाराजांनी त्यांच्या दफ्तरात(accounts मध्ये) करून ठेवलेली आहे.महाराज केलेला प्रत्येक खर्च दफ्तरात लिहित असत कारण हिशोबात पक्के असण्याचा महाराजांचा कटाक्ष होता.५ मार्च १६५९ ला ही तलवार विकत घेतल्याचे येथे नमूद केले आहे.असे असूनही या इतिहासकारांनी असल्या प्रकारचा अपप्रचार का केला असावा हे समजण्याइतके आपण सर्व सुध्न्य आहात.पुन्हा जर कुणी छ.शिवरायांच्या तलवारीच्या बाबतीत असा अपप्रचार केला तर आपण कुणीही या भूलथापांना बळी पडू नये.आपल्या कर्तुत्वावर विश्वास ठेऊन पुढील जीवन जगण्याचा मनोनिग्रह करूया.
..................छ.शिवाजी महाराज की जय.............




माझ्या राजाला दगडाच्या,
मंदिराची गरज नाही..
माझ्या राजाला रोज,
पुजाव लागत नाही..
माझ्या राजाला दुध-तुपाचा,
अभिषेक करावा लागत नाही..
माझ्या राजाला कधी,
नवस बोलावा लागत नाही..
माझ्या राजाला सोने-चांदीचा,
साज ही चढवावा लागत नाही..
एवढ असुनही जे जगातील,
अब्जवधी लोकांच्या..
हृदयावर अधिराज्य,
गाजवतात असे एकमेव राजे

दुनिया के किसी भी क्रिस्चियन से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् और धर्मग्रन्थ कौन सा है तो वोह बोलेगा की मैं क्रिस्चियन हूँ, बाइबिल भगवान् की किताब है और येशु क्राइस्ट भगवान् के बेटे हमारे लिए सबसे पूजनीय है।
दुनिया के किसी भी मुसलमान से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् और धर्मग्रन्थ कौन सा है तो वोह बोलेगा की मैं मुसलमान हूँ और अल्लाह के सिवाय कोई भगवान् नहीं है और मुहम्मद पैगम्बर साहब उनके आखरी रसूल है (لا اله الا الله محمد رسول الله ) और कुरान हमारी सबसे पवित्र किताब है ।

दुनिया के किसी भी सिख से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है तो वोह बोलेगा की गुरु ग्रन्थ साहब हमारे सबसे बड़े भगवान् है, सिखों के दस गुरुओं पे विश्वास करते है और मानते है की भगवान् एक है ।

दुनिया के किसी भी बुद्धिस्ट से पूछो की तुम्हारा भगवान् कौन है तो वोह बोलेगा की वोह भगवान् से ज्यादा मानवता को महत्व देते है और मानवता की राह बताने वाले तथागत भगवान् बुद्ध को अपना आदर्श मानते है और त्रिपिटक उनके लिए सबसे पवित्र है ।
(Special Note/:विशेष सूचना:- पाली भाषा में भगवान् का अर्थ इश्वर (GOD) नहीं होता है।
पाली भाषा में भगवान् का अर्थ है - "जिस किसी भी व्यक्ति ने उसका सभी अज्ञान, लालसा, कामुकता को जड़ से उखाड़ फ़ेंक दिया है ऐसे व्यक्ति को भगवान् कहा गया है ।)

दुनिया के किसी भी नास्तिक से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है? तो वो बोलेगा की वोह भगवान्को नहीं मानते और ना ही कीसी किताब को, वोह तो सिर्फ मानवता को ही मानते है और तर्क पे विश्वास करते है ।

इन सभी लोगों से आपको साफ़ साफ़ जवाब मिलेगा और वोह भी बिना किसी भ्रम (Confusion) के।

अब हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है और तुम्हारा धर्म ग्रन्थ कौन सा है तो आपको ये उत्तर मिलेगा:

अगर महाराष्ट्र के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है, तो वे कहेंगे - गणेश
अगर दिल्ली के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - राम
अगर गुजरात के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - कृष्ण
अगर बंगाल के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - माँ दुर्गा
अगर बिहार के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - शंकर
अगर दक्षिण भारत के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - मुरुगन/ बालाजी
अगर नेपाल के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - पशुपति नाथ

धर्म ग्रन्थ के बारे में पूछोगे तो कोई कहेगा भगवद्गीता, कोई कहेगा रामायण, कोई कहेगा महाभारत, कोई कहेगा वेद, कोई कहेगा उपनिषद्, कोई कहेगा श्रुति, और कोई कहेगा उसको पता नहीं!

आपको साफ़ साफ़ जवाब नहीं मिलेगा और भ्रमित (Confused) हो जाओंगे!

अस्सल में हिन्दू नाम का कोई धर्म ही नहीं है, अगर आप विश्लेषण करें तो हिन्दू ये शब्द मुसलमान राजाओं ने गुलाम बनाये हुए, पकडे हुए, बंदी बनाये हुए उच्च जाती के लोगों को हिन्दू कहा था। हिन्दू का अर्थ सिर्फ और सिर्फ गैर मुस्लिम (Non Muslim) होता है और कुछ नहीं। हिन्दू ये शब्द जो खुद को हिन्दू कहते है और हिन्दू होने पर गर्व करते है उनके किसी भी धर्म ग्रन्थ में नहीं है,न ही वेद में है, ना ही पुरानों में है और ना ही भागवाद गीता में है! इससे ये साबित होता है की हिन्दू ये धार्मिक शब्द नहीं है। तो फिर लोग "हिन्दू, हिन्दू हिन्दू" क्यों चिल्लाते रहते है? अस्सल में हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं है ये तो सिर्फ एक गाली है मुसलमान राजाओं ने दी हुयी! हिन्दू धर्म जिसको कहते है उसका असली नाम है वैदिक धर्म, या सनातन धर्म या फिर ब्राह्मणी धर्म और ये धर्म जाती व्यवस्था (Caste System),छुआ-छूत ( Untouchability) , और मानवता की उच्च निच्चता (lower caste-higher caste) पे आधारित है और इसको सनातन (Eternal) कह गया है, सनातन यानी की कभी ना बदलनेवाला! इसमें सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोगों का ही भला है जिनकी संख्या इस देश के 15% है। फिर ये सभी सनातनी लोग " हिन्दू, हिन्दू, हिन्दू" क्यों चिल्लाते रहते है? वोह इसलिए चिल्लाते रहते है, क्यों की सनातनी धर्म या फिर ब्राहमनी धर्म का नारा लगाया जाय तो कोई भी पिछड़ी जात का, शुद्र जात का, या फिर अनुसूचित जाती/जनजाति का आदमी मुर्ख नहीं बनेगा और ब्राह्मण जो हिन्दू नाम पर लोगों को मुर्ख बनाते आ रहे है उनकी असलीयत, उनकी असली औकात सामने आ जाएगी। जैसे ही उनकी असलियत सामने आएगी वैसे ही ब्राह्मण और उनके पालतू कुत्ते, कुत्ते की मौत मारे जायेंगे!!! हिन्दू ये कोई धर्म नहीं है ये तो एक षड़यंत्र है पिछड़ी जात और अन्य जात के लोगों को मुर्ख बनाने का और उनको दुसरे समुदायों के खिलाफ भड़काने का!


अगर आपको हमारी बात पे जरा भी संदेह है तो आप ऊपर लिखी हुयी सभी बातों की स्वयं पुष्टि कर सकते है।

तुम्ही मराठे असाल, परंतु तुमची जात कोणती?
( खासा मराठा म्हणविणारा )

कुणबी, माळी, मांग, महार या जातींचा उल्लेख महात्मा ज्योतिराव फुले एकत्रितपणे करतात, हे आपण आधीच्या भागात पाहिले. फुल्यांच्या संपूर्ण वाङ्मयात असे उल्लेख ठिकठिकाणी येतात. ‘ब्राह्मणांचे कसब' हा ग्रंथ फुले यांनी या जातींनाच अर्पण केला आहे. अर्पण पत्रिकेत फुले म्हणतात, ‘महाराष्ट्र देशांतील कुणबी, माळी, मांग, महार यांस हे पुस्तक ग्रंथकत्र्याने परम प्रीतीने नजर केले असे'. यावरून फुले यांची या जातींविषयी असलेली तळमळ दिसून येते.
असो. या भागात आपण मराठा-कुणबी हे एक असल्याविषयीचा महात्मा फुले यांचा अधिक स्पष्टपणे समोर येणारा अभिप्राय पाहणार आहोत. फुले यांचे ‘शेतकरयाचा असूड' हे पुस्तक जगप्रसिद्ध आहे. हे पुस्तक लिहित असताना फुले यांची अनेकांशी चर्चा झाली. त्यातील दोन गृहस्थांसोबत झालेल्या चर्चेचा तपशील ज्योतिरावांनी पुस्तकाच्या शेवटी परिशिष्टात दिला आहे. त्यातील पहिल्या परिशिष्टाचे शीर्षक आहे ‘खासा मराठा म्हणविणाराङ्क. हे शीर्षकच अन्वयर्थक आहे. फुले यांची लेखनकामाठी सुरू असताना एक गृहस्थ त्यांच्या घरी येतात. गृहस्थांसोबत झालेला चर्चेचा तपशील फुले यांनी या परिशिष्टात दिला आहे. त्यातील काही अंश पुढे देत आहे-

‘‘त्यांनी (फुले यांच्याकडे आलेल्या गृहस्थाने) आपला मोहरा मजकडे फिरवून , आपणहूनच मला प्रश्न केला की, तुम्ही मला ओळखले नाही काय?''
मी म्हणालो, ‘‘नाही महाराज, मी तुम्हाला ओळखले नाही. माफ करा.''
गृहस्थ म्हणाला, ‘‘मी मराठी कुळातील मराठी आहे.''
मी - तुम्ही मराठे असाल, परंतु तुमची जात कोणती?''
गृ. - ‘‘माझी जात मराठे''
मी - ‘‘महाराष्ट्रात जेवढे म्हणून महारापासून तो ब्राह्मणापर्यंत लोक आहेत, त्या सर्वांसच मराठे म्हणतात. तरी तुम्ही अमुक जातीचे आहात याचा उलगडा तेवढ्याने होत नाही.''
गृ. - ‘‘तर मी कुणबी आहे असे समजा.''


महात्मा फुले यांनी दिलेला हा संवाद इतका स्पष्ट आहे की, मराठा आणि कुणबी या जाती एकच आहेत, हे सांगण्यासाठी आणखी वेगळा पुरावा देण्याची गरजच राहिलेली नाही. ‘‘महाराष्ट्रात जेवढे म्हणून महारापासून तो ब्राह्मणापर्यंत लोक आहेत, त्या सर्वांसच मराठे म्हणतात.ङ्कङ्क हे महात्मा फुले यांचे वाक्य ऐतिहासिक सत्य आहे. महाराष्ट्रातील फौज कोणाच्याही नेतृत्वाखाली लढली, तरी तिला मराठा फौज असेच म्हटले जात असे. कुळवाडी भूषण छत्रपती शिवाजी महाराजांनी स्थापन केलेल्या स्वराज्यातील प्रत्येक शिपाई हा मराठा म्हणूनच ओळखला जात होता. पेशवाईच्या काळात मराठे पाणिपतावर लढले. तेव्हा या फौजेला कोणी पेशव्यांची फौज म्हटले नाही. तिला मराठ्यांची फौज असेच म्हटले गेले. आजही महाराष्ट्राबाहेर मराठी लोकांना मराठे असेच म्हटले जाते. त्यामुळे मराठ्यांची खरी जात कुणबी हीच आहे, हे सिद्ध होते.

Proof :-
महात्मा फुले यांच्या ‘शेतकèयाचा असूड' या ग्रंथातील मराठा-कुणबी याविषयीचे विवेचन करणाèया परिशिष्टाच्या पानाची फोटो कॉपी खाली देत आहे. जिज्ञासूंनी ती अवश्य वाचावी