Tuesday, 7 May 2019

धोखेबाज पुष्यमित्र शुंग (राम)


👆🏻 *मौर्य साम्राज्य के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट बृहद्रथ मौर्य की साजिश के तहत धोखे से हत्या करने वाला हत्यारा ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग...✍🏻*

*👇👇 अखण्ड भारत में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में अखण्ड भारत के निर्माता चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक महान के वंशज मौर्य वंश के 10 वें न्यायप्रिय सम्राट राजा बृहद्रथ मौर्य  की हत्या उन्हीं के सेनापति ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने धोखे से की थी और  खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था ।*

👆🏻 *उसने राजा बनने पर पाटलिपुत्र से श्यालकोट तक सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया था तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का खुलेआम कत्लेआम किया था। पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों व यहाँ की जनता पर बहुत अत्याचार करता था और ताकत के बल पर उनसे ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति अनुसार वर्ण (हिन्दू) धर्म कबूल करवाता था*।

👆🏻 *उत्तर -पश्चिम क्षेत्र पर यूनानी राजा मिलिंद का अधिकार था। राजा मिलिंद बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। जैसे ही राजा मिलिंद को पता चला कि पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर अत्याचार कर रहा है तो उसने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया। पाटलिपुत्र की जनता ने भी पुष्यमित्र शुंग के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर दिया, इसके बाद पुष्यमित्र शुंग जान बचाकर भागा और उज्जैनी में जैन धर्म के अनुयायियों की शरण ली*।

*जैसे ही इस घटना के बारे में कलिंग के राजा खारवेल को पता चला तो उसने अपनी स्वतंत्रता घोषित करके पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया*। *पाटलिपुत्र से यूनानी राजा मिलिंद को उत्तर पश्चिम की ओर धकेल दिया*।
👆🏻 *इसके बाद ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग राम ने अपने समर्थको के साथ मिलकर पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी राजधानी साकेत को बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी*...

👆🏻 *राजधानी बनाने के बाद पुष्यमित्र शुंग राम ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, बौद्ध भिक्षुओं का सर (सिर) काट कर लायेगा, उसे 100 सोने की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी। इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में बौद्ध भिक्षुओ  का कत्लेआम हुआ। राजधानी में बौद्ध भिक्षुओ के सर आने लगे । इसके बाद कुछ चालक व्यक्ति अपने लाये  सर को चुरा लेते थे और उसी सर को दुबारा राजा को दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा, बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उस पत्थर पर मरवाकर उसका चेहरा बिगाड़ देता था । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा दता था*।
 *राजधानी अयोध्या में बौद्ध भिक्षुओ  के इतने सर आ गये कि कटे हुये सरों से युक्त नदी का नाम सरयुक्त अर्थात वर्तमान में अपभ्रंश "सरयू" हो गया*।
👆🏻 *इसी "सरयू" नदी के तट पर पुष्यमित्र शुंग के राजकवि वाल्मीकि ने "रामायण" लिखी थी। जिसमें राम के रूप में पुष्यमित्र शुंग और "रावण" के रूप में मौर्य सम्राटों का वर्णन करते हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया था और राजा से बहुत अधिक पुरस्कार पाया था। इतना ही नहीं, रामायण, महाभारत, स्मृतियां आदि बहुत से काल्पनिक ब्राह्मण धर्मग्रन्थों की रचना भी पुष्यमित्र शुंग की इसी अयोध्या में "सरयू" नदी के किनारे हुई*।

👆🏻 *बौद्ध भिक्षुओ के कत्लेआम के कारण सारे बौद्ध विहार खाली हो गए। तब आर्य ब्राह्मणों ने सोचा' कि इन बौद्ध विहारों का क्या करे की आने वाली पीढ़ियों को कभी पता ही नही लगे कि बीते वर्षो में यह क्या थे*
*तब उन्होंने इन सब बौद्ध विहारों को मन्दिरो में बदल दिया और इसमे अपने पूर्वजो व काल्पनिक पात्रों,  देवी देवताओं को भगवान बनाकर स्थापित कर दिया और पूजा के नाम पर यह दुकाने खोल दी*।

👆🏻 *ध्यान रहे उक्त बृहद्रथ मौर्य की हत्या से पूर्व भारत में मन्दिर शब्द ही नही था,  ना ही इस तरह की संस्क्रति थी। वर्तमान में ब्राह्मण धर्म में पत्थर पर मारकर नारियल फोड़ने की परंपरा है ये परम्परा पुष्यमित्र शुंग के बौद्ध भिक्षु के सर को पत्थर पर मारने का प्रतीक है*।

👆🏻 *पेरियार रामास्वामी नायकर ने भी " सच्ची रामायण" पुस्तक लिखी जिसका इलाहबाद हाई कोर्ट केस नम्बर* *412/1970 में वर्ष 1970-1971 व् सुप्रीम कोर्ट 1971 -1976 के बीच में केस अपील नम्बर 291/1971 चला* ।
*जिसमे सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस पी एन भगवती जस्टिस वी आर कृषणा अय्यर, जस्टिस मुतजा फाजिल अली ने दिनाक 16.9.1976 को निर्णय दिया की सच्ची रामायण पुस्तक सही है और इसके सारे तथ्य सही है। सच्ची रामायण पुस्तक यह सिद्ध करती है कि "रामायण" नामक देश में जितने भी ग्रन्थ है वे सभी काल्पनिक है और इनका पुरातात्विक कोई आधार नही है*।
👆🏻 *अथार्त् 100% फर्जी व काल्पनिक है*।

Friday, 5 April 2019

बाबासाहेबांची जयंती कधी आणि कोणी सुरू केली ?


जुन्या काळातील एक थोर सामाजिक कार्यकर्ते जनार्दन सदाशिव रणपिसे यांचा जन्म सासवड येथे 24 ऑगस्ट 1898 मध्ये झाला. ज्या काळात शिक्षणाच्या सोयी वा सवलती उपलब्ध नव्हत्या त्या काळात पुणे जिल्ह्यातील दलित समाजातील ते पहिले मॅट्रिक्युलेट झाले यातच त्यांचा मोठेपणा आहे. मॅट्रिकची परीक्षा उत्तीर्ण झाल्यावर त्यांनी पुण्याच्या फर्ग्युसन कॉलेजमध्ये दोन वर्षे अभ्यास केला. 1918 ते 21 साली त्यांनी सन्मार्ग दर्शक मंडळाची स्थापना करून सामाजिक सभा, संमेलने मौलिक व्याख्याने नाटके प्रौढांकरता रात्रीचे वर्ग चालवले. सोबतच व्यायामशाळा काढून तरूण सुशिक्षितांमध्ये नवचैतन्य निर्माण केले.

महार सेवादलाची त्यांनी स्थापना केली. तिचे ते कमांडर इन चीफ बनले. राजकारण त्यांनी जास्त केले नाही परंतु सामाजिक कार्याचे ते अध्वर्यू होते. समाजकार्यात त्यांचा मोठा वाटा आहे. पुण्यात डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांना मानपत्र तीन हजार रुपये प्रेस फंड पाच हजार रुपये इमारत फंड जमवण्यात त्यांचा मोठा वाटा होता. पुण्यात युवक परिषद भरवली गेली ती पुणे जिल्ह्यासाठी किंवा शहरासाठी नव्हती. त्यात संबंध महाराष्ट्रातील प्रतिनिधी आले होते. 1939 साली कायदे मंडळात चौदाही प्रतिनिधी निवडून गेले. त्याचे श्रेय बाऊसाहेब रणपिसे यांचेकडे ओघानेच जाते.

महात्मा गांधी यांनी पुण्यात उपवास केला त्यावेळी बाबासाहेबांचा मुक्काम नॅशनल हॉटेसमध्ये होता. त्यावेळी रणपिसे यांनी मोलाची कामगिरी बजावली. विशेष म्हणजे ते त्यावेळी सरकारी नोकरी करत होते. अशा रीतीने ते एक समाजसेवाच करत होते.


पहिली जयंती

डॉ बाबासाहेब यांचा पहिला वाढदिवस पुण्यात प्रथम 14 एप्रिल 1928 रोजी रणपिसे यांनी साजरा केला. इतकेच नव्हे तर या जन्मदिवस समारंभाचे ते जणू शिल्पकारच ठरले. बाबासाहेबांच्या जयंतीची प्रथा त्यांनीच सुरू केली. खडकी पत्र विभाग दलित मंडळाचे अध्यक्ष असताना जयंतीचे औचित्य साधत त्यांनी बाबासाहेबांची प्रतिमा हत्तीच्या अंबारीत ठेवून प्रभात फिल्म कंपनीच्या रथातून, उंटावरून प्रचंड मिरवणुका काढल्या होत्या.

यानंतर खडकी भागात प्रत्येक वस्तीत आंबेडकरांची जयंती साजरी व्हायला लागली. या सर्व वस्त्यांचे भाऊसाहेबांनी एकीकरण घडवून दलित मंडळाची स्थापना केली, या मंडळातर्फे आंबेडकरांची जयंती भव्य प्रमाणात साजरी केली. 24 ऑगस्ट 1958 रोजी रणपिसे यांच्या 60 व्या वाढदिवसानिमित्त मित्रमंडळीने पुणे शहरात त्यांचा सत्कार समारंभ घडवून आणला होता. बाबासाहेबांची पहिली जयंती साजरी करत या उपक्रमाची सुरुवात करणाऱ्या भाऊसाहेबांनी विद्यार्थ्यांसोबतच अस्पृश्यवर्गाची जी बहुमोल सेवा केली त्याबद्दल संपूर्ण आंबेडकरी समाज त्यांचा सदैव ऋणी राहील यात शंका नाही.

(लोकराज्यच्या एप्रिलच्या अंकातून साभार, लेखक – मिलिंद मानकर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या आठवणींचे संग्राहक)

Wednesday, 27 February 2019


हिंदू फारसी, दलित असंवैधानिक शब्द

आज हमारे देश में दो शब्दों को लेकर समाज में एक बड़ी भ्रांति फैली हुई है, पहला हिंदू और दूसरा दलित। ये दोनों शब्द समाज की संरचना में दो विपरीत ध्रुवों के वाहक के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। दो अलग-अलग ध्रुवों की पहचान के चलते ही ये दोनों शब्द न केवल समाजगत बाधाओं में उलझे हुए है बल्कि समय-समय पर विवाद के रूप में भी सामने आए हैं। इसके इतर इन शब्दों की समाज के अलग- अलग वर्ग और दायरों में (दलित-गैर दलित ) अपना स्थान है। दलित शब्द की पहचान भारत के संदर्भ में ख्यात है तो हिंदू शब्द की पहचान हिंदुस्तानी संदर्भ में। आज देश में इन दो शब्दों को लेकर समय-समय पर बखेड़ा खड़ा होता रहता है। असल में वे दोनों शब्द संवैधानिक है ही नहीं। हिंदू शब्द तो भारत का भी नहीं है। यह फारसी है। इन दोनों शब्दों को संविधान में कहीं भी स्थान नहीं मिला है। इसे दूसरे शब्दों में कहे तो ये दोनों शब्द असंवैधानिक हैं, फिर भी ये दो शब्द आज समाज में न केवल व्यापक स्तर पर प्रचलित हैं बल्कि इनके साथ लोगों की भावनाएं भी अलग-अलग तरीके से जुड़ी हुई हैं। हिंदू असल में फारसी का शब्द है। इसी कारण इसका जिक्र न तो वेद में है, न पुराण में, न उपनिषद में, न आरण्यक में, न रामायण में न ही महाभारत में। स्वयं दयानन्द सरस्वती इस बात को कबूल चुके हैं कि यह मुगलों द्वारा दी गयी गाली है। बता दें कि सन् 1875 में ब्राह्मण दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की थी न कि हिंदू समाज की। आज इसके बारे में अनपढ़ ब्राह्मण भी जानता है कि हिंदू शब्द मुगलों द्वारा दी गई गाली है। इसी के चलते ब्राह्मणों ने स्वयं को हिन्दू कभी नहीं कहा। आज भी वे स्वयं को ब्राह्मण कहते हैं, लेकिन सभी शूद्रों को हिंदू कहते हैं। ब्राह्मणों ने मुगलों से कहा हम हिन्दू नहीं हैं बल्कि तुम्हारी तरह ही विदेशी हैं। इसी के चलते सारे हिंदुओं पर जजिया लगाया गया, लेकिन ब्राह्मणों को इससे मुक्त रखा गया। सन् 1920 में ब्रिटेन में वयस्क मताधिकार की चर्चा शुरू हुई थी। ब्रिटेन में भी दलील दी गयी कि वयस्क मताधिकार सिर्फ जमींदारों व करदाताओं को दिया जाए, लेकिन लोकतंत्र की जीत हुई। वयस्क मताधिकार सभी को दिया गया। देर सबेर गुलाम भारत में भी यही होना था। ब्राह्मणों ने सोचा यदि भारत में वयस्क मताधिकार लागू हुआ तो अल्पसंख्यक ब्राह्मण मक्खी की तरह फेंक दिये जाएंगे। अल्पसंख्यक ब्राह्मण कभी भी बहुसंख्यक नहीं बन पाएगें। सत्ता बहुसंख्यकों के हाथों में चली जाएगी, तब सभी ब्राह्मणों ने मिलकर 1922 में हिंदू महासभा का गठन किया जो ब्राह्मण स्वयं को हिंदू मानने कहने को तैयार नहीं थे, वयस्क मताधिकार से विवश होकर हिंदू नामक पहचान को मोहताज हुए और तभी से समाज में हिंदू शब्द प्रचलन में आ गया। अब हम दलित शब्द की उत्पति के बारे में जानते हैं। 'दलित' शब्द आया कहां से, क्या आपके पास इसका जवाब है? क्या आपको पता है कि किसने इस शब्द को सबसे पहले इस्तेमाल किया? किसने इस शब्द को समाज के पिछड़े तबके से जोड़ा। इस शब्द का जिक्र सबसे पहले 1831 की मोल्सवर्थ डिक्शनरी में मिलता है। इसके बाद 1921 से 1926 के बीच 'दलित' शब्द का इस्तेमाल 'स्वामी श्रद्धानंद' ने भी किया था। दिल्ली में दलितोद्धार सभा बनाकर उन्होंने दलितों को सामाजिक स्वीकृति की वकालत की थी। कभी-कभी डा. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भी दलित शब्द को प्रयोग में लाते थे, लेकिन वे अक्सर डिप्रेस्ड क्लास शब्द का ही इस्तेमाल करते थे, अंग्रेज भी इसी शब्द का इस्तेमाल करते थे। हालांकि इस शब्द को सामाजिक स्वीकारोक्ति दलित पैंथर्स नामक संगठन ने दी है। दलित पैंथर्स ने ही पिछड़ों को नया नाम दलित दिया था। सन् 1972 में महाराष्ट्र में 'दलित पैंथर्स' मुंबई नाम का एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन बनाया गया था, आगे चलकर इसी संगठन ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। नामदेव ढसाल, राजा ढाले और अरुण कांबले इसके शुरुआती प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं। माना जाता है कि इसका गठन अफ्रीकी-अमेरिकी ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रभावित होकर किया गया था। यहीं से 'दलित' शब्द को महाराष्ट्र में सामाजिक स्वीकृति मिली, लेकिन अभी तक दलित शब्द उत्तर भारत में प्रचलित नहीं हुआ था। उत्तर भारत में दलित शब्द को प्रचलित करने का काम दलितों के आधुनिक मसीहा के रूप में पहचाने जाने वाले कांशीराम ने किया। डीएसवाय जिसका मतलब है दलित शोषित समाज संघर्ष समिति, इसका गठन स्वयं कांशीराम ने ही किया था। अब महाराष्ट्र के बाद उत्तर भारत में पिछड़ों और अति-पिछड़ों को दलित कहा जाने लगा था। कांशीराम का नारा भी था कि ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़ बाकी सब ड़ीएस-फोर। दलित चिंतकों और सामाजिक वैज्ञानिकों का एक तबका ऐसा भी है जो यह मानता है कि 'दलित' शब्द दरअसल लोकभाषा के शब्द दरिद्र से आया है। किसी जाति विशेष से यह शब्द नहीं जुड़ा है इसलिए इसे स्वीकृति भी बड़े पैमाने पर मिली। बहरहाल हम यह जान लें कि ये दोनों शब्द संवैधानिक नहीं है बावजूद इसके समाज में अपना अहम स्थान रखते हैं। -संजय रोकड़े

करवाचौथ व्रत या पत्नी को गुलामी का
अहसास दिलाने का एक और दिन?
'श्रद्धा या अंधविश्वास'
दोस्तों क्या महिला के उपवास रखने से पुरुष
की उम्र बढ़ सकती है?क्या धर्म का कोई
ठेकेदार इस बात की गारंटी लेने को तैयार
होगा कि करवाचौथ जैसा व्रत करके पति
की लंबी उम्र हो जाएगी? मुस्लिम नहीं
मनाते, ईसाई नहीं मनाते, दूसरे देश नहीं मनाते
और तो और भारत में ही दक्षिण, या पूर्व में
नहीं मनाते लेकिन इस बात का कोई सबूत
नहीं है कि इन तमाम जगहों पर पति की उम्र
कम होती हो और मनाने वालों के पति की
ज्यादा,
क्यों दोस्तों है किसी के पास कोई जवाब?
दोस्तों यह व्रत ज्यादातर उत्तर भारत में
प्रचलित हैं, दक्षिण भारत में इसका महत्व ना
के बराबर हैं, क्या उत्तर भारत के महिलाओं के
पति की उम्र दक्षिण भारत के महिलाओं के
पति से कम हैं ?क्या इस व्रत को रखने से उनके
पतियों की उम्र अधिक हो जाएगी?क्या
यह व्रत उनकी परपरागत मजबूरी हैं या यह एक
दिन का दिखावा हैं?
दोस्तों इसे अंधविश्वास कहें या आस्था की
पराकाष्ठा?पर सच यह हैं करवाचौथ जैसा
व्रत महिलाओं की एक मजबूरी के साथ उनको
अंधविश्वास के घेरे में रखे हुए हैं।कुछ महिलाएँ इसे
आपसी प्यार का ठप्पा भी कहेँगी और साथ
में यह भी बोलेंगी कि हमारे साथ पति भी
यह व्रत रखते हैं। परन्तु अधिकतर महिलाओं ने इस
व्रत को मजबूरी बताया हैं।
एक कांफ्रेस में मैंने खुद कुछ महिलाओं से इस व्रत
के बारे में पूछा उनका मानना हैं कि यह
पारंपरिक और रूढ़िवादी व्रत है जिसे घर के
बड़ो के कहने पर रखना पड़ता हैं क्योंकि कल
को यदि उनके पति के साथ संयोग से कुछ हो
गया तो उसे हर बात का शिकार बनाया
जायेगा, इसी डर से वह इस व्रत को रखती हैं।
क्या पत्नी के भूखे-प्यासे रहने से पति
दीर्घायु स्वस्थ हो सकता है? इस व्रत की
कहानी अंधविश्वासपूर्ण भय उत्पन्न करती है
कि करवाचौथ का व्रत न रखने अथवा
अज्ञानवश व्रत के खंडित होने से पति के
प्राण खतरे में पड़ सकते हैं, यह महिलाओं को
अंधविश्वास और आत्मपीड़न की बेड़ियों में
जकड़ने को प्रेरित करता है। सारे व्रत-उपवास
पत्नी, बहन और माँ के लिए ही क्यों हैं? पति,
भाई और पिता के लिए क्यों नहीं?क्योंकि
महिलाओं की जिंदगी की कोई कीमत तो
है नहीं धर्म की नज़र में, पत्नी मर जाए तो
पुरुष दूसरी शादी कर लेगा, क्योंकि सारी
संपत्ति पर तो व्यावहारिक अधिकार उसी
को प्राप्त है। बहन, बेटी मर गयी तो दहेज बच
जाएगा। बेटी को तो कुल को तारना नहीं
है, फिर उसकी चिंता कौन करे?
अगर महिलाओं को आपने सदियों से घरों में
क़ैद करके रख के आपने उनकी चिंतन शक्ति को
कुंद कर दिया हैं तो क्या अब आपका यह
दायित्व नहीं बनता कि, आप पहल करके उन्हें
इस मानसिक कुन्दता से आज़ाद करायें?
मैं कुछ शादीशुदा लोगों से पूछना चाहता हूँ
की क्या आज के युग में सब पति पत्निव्रता हैं?
आज की अधिकतर महिलाओं की जिन्दगी
घरेलू हिंसा के साथ चल रही हैं जिसमें उनके
पतियों का हाथ है। ऐसी महिलाओं को
करवाचौथ का व्रत रखना कैसा रहेगा?
भारत का पुरुष प्रधान समाज केवल नारी से
ही सब कुछ उम्मीद करता हैं परन्तु नारी का
सम्मान करना कब सोचेगा?
एक बात और, मैंने अपनी आँखो से अनेक
महिलाओ को करवा चौथ के दिन भी
विधवा होते देखा है जबकि वह दिन भर
करवा चौथ का उपवास भी किये थी। दो
वर्ष पहले मेरा मित्र जिसकी नई शादी हुई
और पहली करवाचौथ के दिन सड़क हादसे में
उसकी मृत्यु हो गई, उसकी पत्नी अपने पति
की दीर्घायु के लिए करवाचौथ का व्रत
किए हुए थी, तो क्यों ऐसा हुआ? इसीवास्ते
मुझे लगता है की,करवा चौथ के आधार पर जो
समाज मे अंध विश्वास, कुरीति, पाखंड फैला
हुआ है, उसको दूर करने के लिए पुरुषों के साथ
खासतौर से महिलाए अपनी उर्जा लगाये
तो वह ज्यादा बेहतर रहेगा।
2) Balendu Swami
मैं अपने आस-पास की करवा चौथ रखने वाली
कुछ महिलाओं को व्यक्तिगत रूप से जानता
हूँ: एक महिला जो 15 साल से विवाहित है
और रोज आदमी से लड़ाई होती है, सभी
जानते हैं कि इनका वैवाहिक जीवन नरक है.
दूसरी महिला जिसकी महीने में 20 दिन
पति से बोलचाल बंद रहती है और वो उसे
छुपाती भी नहीं है तथा अकसर ही अपनी
जिन्दगी का रोना रोती है.
इस तीसरी महिला को हफ्ते में दो तीन
बार उसका पति दारु पीकर पीटता है और
उस महिला के अनुसार वेश्याओं के पास भी
जाता है।
चौथी महिला के अपने मोहल्ले के ही 3 अलग
अलग पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध हैं और
इसे लेकर पति के साथ लड़ाई सड़क पर आ चुकी
है तथा सबको पता है।
पांचवीं महिला की बात और भी विचित्र
है: उसका अपने पति से तलाक और दहेज़ का केस
कोर्ट में चल रहा है. केवल कोर्ट में तारीखों
पर ही आमना सामना होता है!
परन्तु ये सभी करवा चौथ का व्रत रखतीं हैं!
क्यों रखती हैं तथा इनकी मानसिक
स्थिति क्या होगी? ये कल्पना करने के लिए
आप लोग स्वतंत्र हैं!
Mahesh Rathi
करवा चोथ का अध्यन मेने किया तब पाया
की दुनिया की बहुत छोटी संख्या इसको
मनाती हे ........कन्या भ्रूण हत्या के जो
कारण हे उसमे करवा चोथ के पीछे की
भावना भी एक बड़ा बुराई हे
.........महिलाओ द्वारा महिलाओ के लिए
जो ताबूत बनाये गए हे उसमे विधवा तथा
पुनर्विवाह का विरोध भी एक हे तथा
करवा चोथ उसका सामूहिक प्रदर्शन हे
........जो महिलाये करवा चोथ मनाती हे
...शायद वो अनजाने में विधवा विवाह तथा
लडकियो के पुनर्विवाह का भी विरोध
करती हे. पढ़ी लिखी लडकिया आजकल
करवा चोथ अपने मन से नहीं मनाती .......जैसे
जैसे लडकियो की शिक्षा का विकाश
होगा तथा समाज में सभ्यता का विकाश
होगा ........महिलाओ की मानवीय
गरिमा का इस तरह विरोध करने वाले
त्यौहार................क्या त्यौहार भी गिने
जाने चाहिए ?. इनका समर्थन नहीं किया
जाना चहिये....... अधिकांश महिलाये
पर्दा रखती थी लेकिन कुछ महिलाओ ने
पर्दा हटाया तथा आज वो गायब हे....ठीक
इसी तरह ये भी एक दिन गायब होगा।


हम हिन्दू नही हैं ।----
संविधान के अनुच्छेद 330 -342 से प्रमाणित है कि
अनु.जाति / जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के लोग हिन्दू
नही हैं । यदि किसी में दम है तो प्रमाणित करके
बताये कि अनु.जाति /जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के
लोग हिन्दू हैं । विदेशी हिन्दू संस्कृति , विदेशी मुगल
संस्कृति और विदेशी ईसाई संस्कृति इन तीनों
संस्कृतियों के आधार पर भारत में किसी को आरक्षण
नही मिलता है । सरकारी दस्तावेजों में अनु.जाति /
जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के लोगों से जो हिन्दू धर्म
का कॉलम भरवाया जाता है वह भारतीय संविधान
के अनुच्छेद 330 और 332 के अधीन अवैधानिक है ।
जिस पर माननीय न्यायालय में वाद लाया जा
सकता है ।
कुछ लोगों का मत है कि पहले आप जातिगत आरक्षण
खत्म करो । तब जातिवाद अपने आप समाप्त हो
जायेगा । मैं ऐसे लोगों को शुद्ध हिन्दी में समझा
देता हूँ कि अनु.जाति / जनजाति एवं पिछड़े वर्ग को
आरक्षण किसी धर्म की जातियों का भाग होने पर
नही मिला है । अनु.जाति /जनजाति एवं पिछड़े वर्ग
के लोग भारतीय मूलवासी हैं और उन पर विदेशी आर्य
संस्कृति अर्थात वैदिक संस्कृति अर्थात सनातन
संस्कृति अर्थात हिन्दू संस्कृति ने इतने कहर जुल्म और
अत्यचार ढाये जिनको पढ़ कर , सुनकर और देखकर मन में
अथाह दर्द भरी बदले की चिंगारी उठती है , जिसका
वर्णन नही किया जा सकता । जो धर्म जिन लोगों
पर अत्याचार जुल्म और कहर ढाता है । वे लोग उस धर्म
के अंग कैसे हो सकते हैं । हमें आरक्षण इसलिए नही
मिला है कि हम हिन्दू रूपी वर्ण और जाति के अंग हैं ।
यह जातियाँ हिन्दुवादी लोगों ने कार्य के आधार पर
भारतीय मूल वासियों पर अत्याचार करने के अनुरूप
जबरदस्ती थोपी हैं । जबकि भारतीय मूलवासी लोग
देश के विकास के लिए इस प्रकार के धंधे करते थे । उन्ही
धंधों के आधार पर विदेशी हिन्दू संस्कृति ने भारतीय
मूलवासियों को ऊँचता नीचता के आधार पर
विघटित कर दिया और उस ऊँचता - नीचता के आधार
पर तरह तरह के जुल्म एवं अत्याचार भारतीय
मूलवासियों पर ढाये गए । हिन्दू संस्कृति ने भारतीय
लोगों पर जाति एवं वर्ण के आधार पर जितने
अत्याचार किये । उन अत्याचारों का आकलन
संविधान निर्माण कमेटी ने किया । उस आकलन के
आधार पर भारतीय मूलवासियों को आरक्षण मिला
है न कि हिंदुओं की तथाकथित जाति होने पर । जो
हिन्दू शास्त्र अनु.जाति /जनजाति एवं पिछड़े वर्ग
को बुरी बुरी गालियों से नवाजते हैं । वे लोग हिन्दू
संस्कृति के अंग कैसे हो सकते हैं । जैसे -
किसी भी संस्कृत ग्रन्थ को उठाकर देख लीजिये ,
सभी में SC/ST/OBC एवं समस्त स्त्री जाति के लिए
गालियों का भण्डार भरा पड़ा है | जैसे – ढोल गवांर
शूद्र पशु नारी | सकल ताड़ना के अधिकारी ||
( रामचरित मानस पृष्ठ संख्या 663 पर ) | जे वर्णाधम
तेली कुम्हारा | स्वपच , किरात कोल कलवारा ||
रामचरित मानस के पृष्ठ 870 पर गोस्वामी
तुलसीदास ने लिखा है कि तेली , कुम्हार , चाण्डाल
, भील , कोल और कल्हार आदि वर्ण में नीचे हैं अर्थात
शूद्र हैं |
महिं पार्थ व्यापाश्रित्य स्यू : येsपि पाप योनया : |
स्त्रियों वैश्यार तथा शूद्रास्तेSपि यान्ति प्राम
गतिम ||
( गीता अध्याय – 9 श्लोक 32 )
अर्थात – हे अर्जुन ! स्त्री , शूद्र तथा वैश्य पापयोनि
के होते हैं , परन्तु यदि ये भी मेरी शरण में आ जाएं तो
उनका भी उद्धार मैं कर देता हूँ |
वर्द्धकी नापितो गोप : आशाप : कुंभकारक |
वाणिक्कित कायस्थ मालाकार कुटुंबिन ||
वरहो मेद चंडाल : दासी स्वपच कोलका |
एषां सम्भाषणात्स्नानं दर्शनादार्क वीक्षणम ||
( व्यास स्मृति – 1/11-12)
अर्थात – व्यास स्मृति के अध्याय – 1 के श्लोक 11
एवं 12 से भारतीय समाज को शिक्षा मिलती है कि
बढई , नाई , ग्वाल , कुम्हार , बनिया , किरात ,
कायस्थ , भंगी , कोल , चंडाल ये सब शूद्र (नीच)
कहलाते हैं . इनसे बात करने पर स्नान और इनको देख लेने
पर सूर्य के दर्शन से शुद्धि होती है |
जो संस्कृत ग्रन्थ भारतीय समाज के लोगों को इस
प्रकार की गालियों से नवाजते हैं , वे उस संस्कृति के
अंग कैसे हो सकते हैं ? हिन्दू संस्कृति के ऐसे दुराचरण के
कारण ही भारतीय मूलवासियों को आरक्षण मिला
है । न कि हिन्दू धर्म के कारण ।



बलि या क़ुरबानी
कितना सही कितना गलत,कुछ
सच्चाई है या फिर
अंधविश्वास------
बलि या कुर्वानी हिंदू और
मुस्लिम समाज का अभिन्न अंग
रहा है दोनों समाज सदियोँ से
इसे सही ठहराते आये है ,चालिए
आज दोनों का नंबर एक साथ
लगा देते है वरना मुझ पर पक्षपात
का आरोप लगेगा ,पोस्ट
को रुचिकर बनाने के लिए मुद्दे से
भटकना भी जरुरी है पर
इतना विस्वास रखिये सच्चाई से
नहीं भटका जायेगा ,सबसे पहले
हिंदू समाज में बलि प्रथा पर
प्रकाश डालते है फिर मुस्लिम
समाज की क्लास
ली जायेगी ---
हिंदू समाज में बलि प्रथा -----
हिंदू समाज में
बलि प्रथा सदियों से
चली आयी है अब मुझे
ना तो बलि प्रथा का डिटेल
इतिहास पता है और
पता भी होता तो बता कर
आपको पकाना नहीं चाहता,बस
इतना पता है लोग देवी/देवताओ
को प्रसन्न करने के लिए निर्दोष
जानबरों की बलि दिया करते थे
अब भी दिया करते है पर इस
प्रथा में कमी आई है क्यूँ कि अब
अकल नाम की बस्तु का विकास
हो गया है और लोगों को समझ
आने लगा है बलि से कोई भगवान
प्रसन्न नहीं होते वो तो कुछ
पाखंडियों ने अपने लाभ के लिए
ऐसी प्रथा बना दी थी जिसका लोगों ने
आँखें बंद करके विस्वास कर
लिया और इस प्रथा को आगे
बढ़ाते गये ,वैसे भी हिंदू समाज
अंधविश्वासों की पोटली रहा है
सभी प्रकार के अंधविस्वास
यहाँ पाए जाते थे समय के साथ
और अकल के उदय के साथ कुछ
तो विलुप्त हो गये और कुछ अब
भी वाकी है ,आप अब भी पिछड़े
हुये एरिया में चले जाएये अब
भी निर्दोष
जानबरों की बलि दी जाती है
जब की विकसित एरिया में
ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है
मतलव साफ़ है बलि से कोई
देवी देवता प्रसन्न
नहीं होता अगर प्रसन्न
होता तो सभी विकसित देश
रोज बकरे-मुर्गे कटवाते .
मुस्लिम समाज और
कुर्वानी ------बदलाव
ही प्रक्रति का नियम है,मजबूत
से मजबूत किले में मरम्मत कि जरुरत
होती है अगर मरम्मत
नहीं होगी तो किला ढह
जायेगा और जो समय के साथ
बदलाव
नहीं लाएगा वो विकास
की विकास की दौड़ में पीछे रह
जायेगा उदहारण के लिए
सभी मुस्लिम समाज और मुस्लिम
देशों को देख लीजिए कुछ
देशो को छोड़ दिया जाये
जो तेल की अधिकता के कारण
अमीर हैं .
मुस्लिम समाज में बलि का बहुत
महत्ब है पर सिर्फ बातों में और
किताबों में इसके
आलावा किसी को सच
जानना भी नहीं है सब लकीर
की फ़कीर के राह पर चलते है ,अरे
मिया अगर बलि से खुदा प्रसन्न
हो जाते तो भारत और विश्व के
मुस्लिम इतने पिछड़े क्यूँ होते ???
एक निर्दोष जानबर की हत्या से
खुदा कैसे प्रसन्न हो सकते है अगर
हो सकते है वर्ल्ड कप और
सभी मेडल सभी मुस्लिम देश
बटोर कर ले
जाते ,कितना भी लिख
लो रिजल्ट धाक के तीन पात
रहेगा क्यूँ की जिस समाज में
गलती को स्वीकार करने
की इजाजत नहीं है वो बदलाव
कैसे करेगा ,बदलाव
नहीं होगा तो पिछड़ापन
होगा जैसा हो रहा है,कोई
भी धर्म या मजहब १०० % परफेक्ट
नहीं होता समय के साथ बदलाव
की जरुरत होती है,एक कड़वा सच
है कोई भी मुस्लिम आज के समय में
इस्लाम के सारे नियम नहीं मान
सकता लिखने के लिए बहुत कुछ
नहीं पोस्ट विवादित
हो जायेगा,क़ुरबानी का मीन्स
बुराइयों को कुर्वान करना है
ना की निर्दोष जानबर
की बिना कारण
हत्या करना है .
बलि /कुर्वानी हिंदू समाज में
दी जा रही हो या मुस्लिम
समाज में सिर्फ
अंधविश्वास,पिछड़ाप
न ,नासमझी ,जीव-हत्या और
पाप है ,जो लोग इसे सही मानते
है वो देवताओ
या खुदा को प्रसन्न करने के लिए
अपने बच्चों की बलि दें इससे
वो और जल्दी प्रसन्न हो जायेंगे
अब बलि /कुर्वानी का सपोर्ट
करने वालों को सांप सूंघ
जायेगा या लकवा मार
जायेगा.
कोई
भी कितना ही ज्ञानी हो बुद्धिमान
हो और कही भी लिखी हुई बात
पर आँखें बंद करके विस्वास मत
कीजिए क्यूँ की भगवान/खुदा ने
सबको दिमाग ,आख ,कान,नाक
दी हैं सिर्फ सही से इस्तिमाल
करने के लिए किसी बेगुनाह
की मौत से सिर्फ
हत्या होती है कोई लाभ
नहीं होता अगर कोई लाभ
होता तो रिजल्ट सामने आते
रहते .


पोस्ट बड़ी है पर पड़े जरुर.....
भगवान धूर्त, चालाक और
मक्कार लोगो के
शैतानी दिमाग
का सामाजिक, राजनैतिक और
आर्थिक षड्यंत्र है | इसको निम्न
प्रकार से समझा जा सकता है-
१. भगवान की रचना करके
लोगो को भगवान के नाम पर
डराया गया जिससे लोग
उसकी पूजा-अर्चना और
उपासना करने के लिए मजबूर हुए |
२. भगवान् की पूजा अर्चना करने
के लिए एक पवित्र स्थान
की जरुरत महसूस हुयी जिसके
लिए मंदिर निर्माण
की आवश्यकता हुयी |
३. मंदिर बनवाने के लिए धन
की आवश्यकता हुयी और धन
लोगो से श्रद्धा के नाम पर
लिया गया और मंदिर निर्माण
के साथ साथ भगवान के
रचयिताओ का भी भला हुआ |
४. भगवान की रचना के बाद
लोगो को तरह तरह से
डराया गया जिससे पाखंडो और
अन्धविश्वासो को बढ़ावा मिला |
५. पाखंडो और अन्धविश्वासो से
डरकर लोग बाग उसके
रचयिता की शरण में उनसे बचने के
उपाय जानने के लिए जाने शुरू हुए
जिनसे उनकी आमदनी शुरू
हुयी और आपका पैसा जाने
लगा |
६. भगवान के नाम पर पाप और
पुण्य का खेल शुरू हुआ और पुण्य
कमाने के नाम पर
आपका पैसा मंदिरों में
जाना शुरू हो गया और उसके
रचयिता धनाढय होते गए |
७. भगवान के नाम पर
किसी को भी बेवकूफ
बनाना सरल था जिससे ये धूर्त
लोग
अपनी निजी दुश्मनी निकालने
के लिए जनता को भड़काकर
दुश्मन के खिलाफ इस्तेमाल करने
लगे और अपने
दुश्मनों का सफाया आसानी से
करने लगे |
८. भगवान की रचना के बाद
उसको आगे चलाने के लिए
आत्मा की रचना की गयी,
जिससे मनुष्य धरती पर अपने
कष्टों के निवारण के नाम पर
ही नहीं बल्कि मृत्यु के बाद होने
वाले कष्टों से बचने के लिए
भी अपनी जेब ढीली करके
भगवान के रचयिताओ का घर भर
सके |
९. आत्मा की रचना के बाद स्वर्ग
और नरक की रचना की गयी और
इनको ऐसी जगह
बना दिया गया जहाँ पर मनुष्य
की मृत्यु के बाद आत्मा के जीवन
भर के कार्यो के आधार पर दंड और
पुरस्कार मिलना था |
१०. स्वर्ग को एक
ऐसी वैभवशाली जगह
बनाया गया जहाँ पर प्रत्येक तरह
की विलासितापूर्ण और
ऐयाशी की चीजे मौजूद थी |
जो चीज इस लोक में त्याज्य
थी वो वहां पर भगवान्
द्वारा खुद दी जा रही थी जैसे
सुरा और सुंदरिया सहित तमाम
तरह की ऐयाशिया | अब कोई इन
चीजो को क्यों प्राप्त
नहीं करना चाहेगा ? स्वर्ग
की लालसा में और स्वर्ग प्राप्त
करने के लिए अपने जीवन भर
की कमाई लुटाने लगे इसके
रचयिताओ पर |
११. अब सत्कर्म वालो के लिए
स्वर्ग था तो ईश्वर
को ना मानने वालो के लिए
भी नरक
की व्यवस्था जरुरी थी | नरक
ऐसी जगह बनायीं गयी जहाँ पर
आपको आपके जीवन भर के
कर्मो का हिसाब देना था और
सजाये ऐसी थी जो क्रूर से क्रूर
देश
भी अपराधियों को नहीं देता है
| जैसे आत्मा को आरे से टुकड़े टुकड़े
करना, आत्मा को खौलते हुए तेल
में पकाना, लोहे की कीलो पर
लिटाना | अब
इतनी यातनादायक जगह पर
कौन जाना चाहेगा तो शुरू
हो गयी अब नरक जाने से बचने के
उपायों के नाम पर कमाई |
१२. कुछ ऐसे लोग जो जीवन भर
इनके चंगुल में नहीं फंस सके
उनको भी फांसने के लिए इन्होने
आखिर तक हार नहीं मानी ऐसे
लोगो को विशेष छूट दी गयी |
इन लोगो से कहा गया आप अपने
जीवन के अंतिम क्षणों में दान
पूण्य कर दीजिये आपको स्वर्ग
की प्राप्ति होगी |
१३. स्वर्ग और नरक
की स्थापना के बाद
इनकी व्यवस्था को सँभालने के
लिए इंद्र और यमराज तथा उनके
सहयोगियों की रचना की गयी |
अब इंद्र और यमराज को प्रसन्न
करने के नाम पर कमाई शुरू |
१४. मृत्यु के बाद
आत्मा की शांति के लिए
चिता जलने से पहले ही दान
दक्षिणा की व्यवस्था की गयी वर्ना मृतक
की आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी |
१५. चिता को अग्नि देने के बाद
पुरोहितो पंडितो को खुश करने
के लिए ब्रह्मभोज जैसी अनेक
प्रथाए शुरू की गयीं जिससे
भगवान के रचयिताओ
का धंधा खूब जोर शोर से चलने
लगा |


"जिस दिन जहन आज़ाद हो जाएगा-मनुवाद और ब्रह्मंवादियो की दुकाने बंद हो जाएगी.."
शरीर की गुलामी से आसानी से मुक्ति मिल जाती हे..
लेकिन मानसिक गुलामी से आज़ाद होने में सदियाँ लगती है....
ब्राह्मणवादी एवं मनुवादियों की संख्या गिनती की हे...
पर उन्हें समर्थन करने वाले और पोषक तत्वों की संख्या अनगिनत हे...
और यह एक कडवा सच हे की 80% मूलनिवासी(दलित-आदिवासी-पिछड़े) आज भी मानसिक रूप से मनुवादियों के गुलाम हैं..
इश्वर-भय से कर्मकांड-पाखण्ड-कुरीतियों-शकुन-अपशकुन आदि करने में सबसे आगे हम ही हैं...
क्या वजह हे की मनुवाद-ब्राह्मणवाद की दुकाने आज भी चल रही हे..
मंदिरों-मस्जिदों-गिरिजाघरो की संख्या बढ़ी ही हे घटी नहीं...
कोर्पोरेट कंपनियों की तरह मंदिरों-मस्जिदों का भी सालाना टर्नओवर निकलने लगा हे..
चढ़ावे के नाम पे काला धन सफ़ेद में बदला जा रहा हे....
और इश्वर के दलाल फल फूल रहे हैं... मनुवाद का कद बढ़ ही रहा हे...
इसका सिर्फ और सिर्फ एक कारण हे....
हम आज भी मानसिक गुलाम हैं.. सामाजिक बेड़ियाँ तोड़ दी गयी हैं...
पर जहन आज भी उन बेड़ियों में जकड़ा हुआ हे...
इश्वर-भय लाजमी हे.. पर उसके निवारण के लिए कर्मकांड का सहारा लेना मूर्खता हे..
आपके हाथ-पैर, आपका समाज काफी हद तक आज़ाद हे...
बस जरुरत हे तो अपनी सोच-अपने जहन को आज़ाद करने की....
भगवन के डर से बचने के लिए पाखण्ड-कर्मकांड का सहारा न लेने की...
जिस दिन जहन आज़ाद हो जाएगा-मनुवाद और ब्रह्मंवादियो की दुकाने बंद हो जाएगी..

अगर लक्ष्मी पूजा करने से धन का आगमान होता या सुख शांति मिलती तो ........ भारत देश को विदेशों से अरबों का उधार लेने की जरुरत नहीं पड़ती और भारत में ८०% जनता की कमाई केवल २० रुपया रोज यानी ६०० रूपया महीना है (हमारा मोबाइल या इलेक्ट्रिक का बिल भी इससे कई ज्यादा होता है)...
दुनिया का सबसे आमिर आदमी बिल गेट्स ने कभी लक्ष्मी की पूजा नहीं की ........ जगत के बिलिन्नेयार्स को लक्ष्मी नाम की देवता भी पता नहीं...
अमेरिका देश मात्र जीसस की पूजा करता है, और वहा गरीबी का पता नहीं (Per Capita Income). वहां के गरीब हमारे अमीरों में गिने जायेंग.......
अरेबियन देश के लोग मात्र अल्लाह की पूजा करते है, जगत के श्रेष्ठ अमीरों में कुछ की गिनती होती है.........
जापान चायना में मात्र बुद्ध की पूजा होती है और सारे लोग आमिर है......
लेकिन लक्ष्मी की सालों से पूजा करने वाले भारत की गरीबी अफ्रीका के कुछ देशों से भी बदतर है...
कड़वा सच ।।
धन की देवी लक्ष्मी की पूजा सिर्फ हमारे देश मे की जाती है,फिर भी देश की 75% जनता गरीबी और भुखमरी से लड़ रही है।।
शिक्षा की देवी सरस्वती की पूजा भी सिर्फ हमारे ही देश मे कि जाती है ।।फिर भी हमारे देश की गिनती सबसे अनपड़ देशो मे होती है।।
अन्न उत्पादन करने कि देवी अन्नपुर्णा की पूजा भी सिर्फ हमारे देश मेँ होती है।।फिर भी हमारे देश के हजारोँ गरीब किसान हर साल अत्महत्या कर लेते है ।।
बारीश के देवता इन्द्र की पूजा भी सिर्फ हमारे ही देश मेँ होती है।।फिर भी कभी सुखा तो कभी बाढ आ जाती है ।।
औरत को हमारे यहाँ देवी का दर्जा दिया जाता है ।।फिर भी दहेज के लिये हर साल हजारो औरतोँ को जिन्दा जला दिया जाता है कन्या भ्रूण हत्या के मामले मेँ अग्रणी देश है भारत।।
अतिथि देवो भवः अतिथि को भगवान माना जाता है ।।फिर भी अक्सर विदेश से आये अतिथियोँ की हत्या या बलात्कार होना हमारे यहाँ आम बात है ।।
नटखट कृष्ण की पूजा भी हमारे ही यहाँ होती है,तो क्या इसी लिये सबसे ज्यादा लड़कियो से छेड़छाड़ और बलात्कार हमारे यहाँ होते है ???
अप्प दिपो भव: अब तो मूर्खता का दामन छोड़ो
ऐसा क्यों ?
कोई भी देश या उस देश का व्यक्ति आमिर या गरीब, किसी भगवान् की पूजा करने से नहीं होता बल्कि उस देश की अर्थ निति और सबको समान संधि उब्लब्ध करने की निति से होता है...
पंसद आये तो सेयर जरुर करे
"मीर महमंद" शिवकालीन चित्रकारानेआपल्यावर
फार मोठे उपकार केलेत....मनुची या इटालीयन
प्रवाशाच्या पुस्तकांतमीर महमंद
या मुसलमानचीत्रकाराने काढलेलेचित्र आहे. हे
चित्र इ.स.१६६५ च्या आसपासकाढलेले असून हे
शिवाजीमहाराजाचेएकमेवअस्सल चित्र ओळखले
जाते .या चित्रात एकूण ३१ अंगरक्षक व शिपाई
आहेतत्यापैकी ७ अंगरक्षकांना अर्धवट तर
१३अंगरक्षकांना भरपूर दाढी-
मिशा आहेत.पेहरावावरून व चेहरेपटीवरून हे
वीसजण मुसलमानअसल्याचेठळकपणे लक्षात
येते . यावरूनशिवरायांच्या सैनिकांत असलेले
मुसलमानसैनिकांचे प्राबल्य लक्षात
येते.शिवाजीराजांची लढाई आदिलशहा,
मुघल,सिद्दी, पोर्तुगीज यांच्याविरुद्ध
होती;ती राजकीय लढाई होती. धार्मिक लढाई
नव्हती.शिवरायाचे पहिले चित्र रेखाटणारा मीर
महंमदहा मुस्लिमच होता. असे असंख्य
मुस्लिमशिवरायांकडे होते. म्हणजे
शिवाजीमहाराजधर्मनिरपेक्ष म्हणजेच
समता,मानवतावादीहोते. शिवचरित्रातून
मानवतावादशिकता येतो.छत्रपतीच्या काळात
असे अनेकनिष्ठावंतमुस्लीम सैनिक होते
ज्याची माहिती आपणासज्ञात नाही हे
लिहिण्याचे प्रयोजनएवढ्याचसाठी की आपण
छत्रपती शिवराय
वछत्रपती संभाजीराजेंना धर्माच्या बंधनात,भाषेच्या
बंधनात अडकवून,या राष्ट्रपुरूषांचे महत्व
कमी करू नये. छत्रपतींचे विचार आपणआचरणात
आणावेत.मित्र-मैत्रीनेनो मग
आपणचसांगा असा धार्मिकसाहिष्णू
ता असलेला राजा मुसलमानविरोधी कसा ??

Wednesday, 30 January 2019

हळदी कुंकू.......

मानसिक गुलामगिरी शारीरिक गुलाम गिरीपेक्षा अधिक घातक असते. कारण त्यात आपण  गुलाम असल्याची  जानीवच होत नाही .म्हणूनच  परंपरेनी  बहाल केलेल्या  सणवारांची  चिकित्सा  न करता त्यांना रहाटगाड्यासारखे  सुरू ठेवल्यास  मानसिक गुलामगिरीचा  विळखा अधिकाधिक  घटट् होत जातो.
    हळदी कुंकवाच्या  निमित्ताने स्त्रियांनचे स्नेहवादी मिलनाचा परंपरा हे असेच लोढणे होय. मुजोर गायी बैलाच्या गळ्यातही गाव खेड्यात लाकडी ओंडक्याचे लोढणे बांधतात. परंतू ते ओझेरूपी  लोडणे लवकर  सोडता येते. मात्र स्त्रियांच्या स्त्रियांच्या मेंदूत भिनलेले खूळचट परंपरांचे लोढणे  निघाल्या शिवाय स्त्रिया स्वसन्मानाची भाषा बिलकूल करणार नाही .

हळदीकुंकू  म्हणजे  काय तर परस्परांच्या सौभाग्याला दिर्घायुष्य चिंतणे. आपल्या  बायकोचे आयुष्य वाढावे म्हणजेच ती दीर्घायुष्य व्हावी अशी कामना करायला लावणारा एकतरी सणवार या संस्कृतीत  आहे काय . नाही ना कारण त्याची पुरूषाला गरजच नाही. हे कोणी शिकवले संस्कृतीने  अशा संस्कृतीत वाढणारी म्हणूनच विज्ञानाचे शिक्षण घेऊनही  अविचारी ,रूढींवादी व स्त्रिविरोधी पुरूषी मानसिकता  तयार होते.
      म्हणूनच भाऊ हा पुरुष आपल्या बहिणीच्या नवऱ्यासाठी व बाप हा पुरुष आपल्या मुलीच्या नवऱ्यासाठी  जावयासाठी  हुंड्याची व्यवस्था करतो. हि खरेदीविक्री कोणाची होते तर  एका स्त्रीची .याचा विचार कोणताही बाप  भाऊ करीत नाही. त्यामुळे बिनबुडाच्या लोटयासारखी  स्त्रीची  अवस्था आहे. म्हणूनच तर तिचे दान केले जाते. आणि पुरुष दानशूर बनतो.
    हळदीकुंकू हे नुसतेच हळदीकुंकू नाहीतर  सांस्कृतिक गु्लामीची खरुज आहे. जिचा प्रसार प्रचार  मकरसंक्रांतीला व्यापक स्तरावर केला जातो. पण त्या खरुजेचेही जतन स्त्रिया केवळ यासाठी भक्ती भावाने करतात कारण त्याचा संबध धर्माच्या परंपरांशी लावला जातो . पण खुळचट परंपरांचा त्याग आणि परंपरांची निर्मिती ही प्रक्रिया सुरु केल्याशिवाय स्त्रियांमध्ये मेंदू नावाचा अवयव आहे असे म्हणता येणार नाही.  धर्माच्या नावावर जर स्त्री विरोधी परंपरांचा धिक्कार स्त्रिया करणार नसतील तर  नुसतीच सावित्रीमाईंची जयंती साजरी करून काय फायदा. त्यापेक्षा तर सत्यवान सावित्रीचा आदर्श घेणे चांगले. 
     परंतु तसाच एखादा तरी सत्यवान या परंपरेनी  का निर्माण होवू दिला नाही जो आपल्या बायकोसाठी एवढा व्याकूळ होतो.  दुसऱ्याच्या सांगण्यावरून  आपल्या बायकोला त्यागणारा पुरुषोत्तमही देव ठरून पुजनीय मानला जातो .तेही कमी ठरेल की काय  स्त्रियांचे कपडे पळवून त्यांना कपडे परत करण्याविषयी  विचार करायला लावणारा स्त्रीलंपट  देवपुरुष महान ठरतो. अर्थात पुरुषांनी आपल्या स्वार्थाखातर हे केले ,आणी स्त्रिया आजही नवर्याला देव मानतात दुर्दैवाने.

Sunday, 13 January 2019

महाराष्ट्र में गुडीपाडवा त्यौहार का सच!

गुडीपाडवा ये त्यौहार महाराष्ट्र में खासकर मनाया जाता है। लेकिन बहोत सारे मूलनिवासी, शुद्र मराठा समाज ने अब तक इसके पीछे का इतिहास जानने की कभी कोशिश नहीं कि। हालाकि संभाजी ब्रिगेड ने सच्चा इतिहास ब...ताने का काम शुरू किया है। लेकीन अभी भी बहोत सारे लोगों को इसका ज्ञान नहीं है।

गुडीपाडवा के दिन शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज को ब्राह्मणों ने औरंगजेब को धोका करके पकड़ के दिया था और उनको मनुस्मृति के अनुसार सजा दी गयी थि। ब्राह्मणों ने उनका सर काटके भाले पे लटकाया गया और उसका जुलूस निकाला क्यों की उन्होंने बुद्ध भूषण नाम का ग्रन्थ बहोत कम उम्र में लिखा था और ब्राह्मणों की दादागिरी को ललकारा था। बहोत सारे ब्राह्मण चोरो को भी उन्होंने पकडवाके संभाजी महाराज ने सजा भी दि। इसका बदला लेने के लिए ब्रह्मनोने संभाजी महाराज की बदनामी की और उनको धोके से मार डाला, वो आज ही के दिन, गुडीपाडवा ! कह जाता है के ये त्यौहार श्री राम अयोध्या वापिस आने पर उनके स्वागत के लिए मनाया जाता है, लेकिन जहा श्री राम वापस आया था उस अयोध्या नगरी में तो कोई गुडीपाडवा ये उत्सव नहीं मनाता? तो फिर महाराष्ट्र में ही क्यों? क्या मराठा समाज को ये विचार कभी आया है?

जब मराठा लोग एक दूसरों को गुडीपाडवा दिन की बधाई देते है तो हमें बड़ा दुःख होता है और उनके अज्ञान पर बड़ा तरस आता है।
औरंगजेब ने संभाजी महाराज कि तऱ्ह आज तक किसी कि भी हत्या नाही कि थी ! महाराज को सरल तरीके से मारणे के बजाय अलग-अलग दंड क्यो दिया? सबसे पहले महाराज कि जीवा काटी गयी ! इससे अनुमान लागाया जा सकता है कि संभाजी महाराज ने संस्कृत भाषा पर प्रभुत्व हासिल किया था ! उन्होने चार ग्रंथो कि रचना कि थी, इसलिये सबसे पहले उनकी जीवा काटने कि ब्राह्मनोने सलाह दि थी ! उसके बाद महाराज के कान,नाक आंखे और चमडी निकाली गयी ! यह घीनौना दंड "मनुस्मृती" संहिता के अनुसार दिया गया !
मतलब औरंगजेब के माध्यम से ब्राह्मनोने संभाजी महाराज को यह दंड दिया ! कवी कुलेश को भी औरंगजेब ने जिंदा नाही छोडा ! क्योंकी अपनी जान से भी ज्यादा चाहनेवाले संभाजी महाराज जैसे स्वाभिमानी ,निर्मल और चाहिते दोस्त के साथ यदि कुलेश गद्दारी कर सकता है,तो वह हमारे साथ भी गद्दारी कर सकता है,इस बात को सोचते हुये औरंगजेब ने कुलेश कि भी जान ले ली ! औरंगजेब ने अपने सगे भाई तथा चाहिते सरदार दिलेरखान ,मिर्झाराजे ,जयसिंग इन वफादार सर्दारो को भी मार डाला ! इसलिये मदत करनेवाले कवी कुलेश को जिंदा रखना औरंगजेब को संभाव नहि था ! क्योंकी औरंगजेब ने कवी कुलेश को उसके काम कि पुरी किमत अदा कि थी !
औरंगजेब ने संभाजी महाराज को धर्मद्वेष के कारण नहि मारा बल्की राजनीतिक संघर्ष कि वजह से मारा ! औरंगजेब ने संभाजी महाराज को केवळ दो सवाल पूछे ! पहला सवाल ,'आपके खजाने कि चाबिया कहा है? ' और दुसरा सवाल था ,'हमारे सर्दारो मे आपकी मुख् बिरी करणेवाला सरदार कौन है?' इसका मतलब औरंगजेब ने संभाजी महाराज को धर्मांतरण करणे का आग्रह नाही किया और ना हि संभाजी महाराज ने इसके बदले मे औरंगजेब के सामने उसकी लडकी कि मांग रखी ! संभाजी महाराज कि हत्या के पाश्च्यात ब्राह्मनोने जल्लोष के तौर पर " गुडीपाडवा ' शुरू किया 

Sunday, 23 December 2018

शिवाजी महाराजांची तलवार

छत्रपती शिवाजी महाराजांच्या ८ प्रमुख तलवारी होत्या,त्यातील सर्वात महत्वाची तलवार फिरंगी किवा भवानी तलवार जी सध्या रोयाल ब्रिटीश संघ्रलाय इंग्लंड मध्ये आहे.
शिवाजी महाराजांनी फिरंगी तलवार उर्फ भवानी तलवार portuguese ...व्यापार्यांकडून विकत घेतली होती.असा म्हंटल्या जाते नंतर शिवरायांनी भवानी मातेसमोर त्या तलवारीची प्रतीस्तापणा केली आणि त्या ताल्वारीमध्ये तोडासा बदल करून तिचे नाव भवानी तलवार ठेवले.
फिरंगी तलवार उर्फ भवानी तलवार ३५ ते ३८ इंची लामब असते ,फिरंगी तलवारला single sided किवा double sided धार असते.व तलवारीची मुठ स्टील ची असते.शिवरायांनी फिरंगी तलवार मध्ये काही बद्दल देखील केले,ते म्हणजे तलवारीच्या मुठीमध्ये कापुसाची गाधी भरली जेणेकरून ती सैनिकांना घाम आल्यावर तलवार हातातून निसटणार नाही.
काही दैववाद करणाऱ्या इतिहासकारांनी असे सांगितले आहे कि शिवरायांना भवानी तलवार स्वयं भवानी मातेने प्रगट होऊन दिले आहे.
जर भवानी मातेने शिवाजी महाराजांना भवानी तलवार दिली तर मग त्याच प्रकारची तलवार शाहजहान ह्या मुस्लीम शासकाकडे व बाजीराव पेशव्याकडे कोठून आली,शाहजहान आणि बाजीराव पेशव्याला पण भवानी माता प्रसन्ना झाली होती का?
सध्या फ्रेंच इतिहासकार फ्रान्सीस gouitier ह्या फ्रेंच इतिहासकाराने भवानी माता शिवरायांना तलवार देतांनाचा पुतळा बनवला आहे,अश्या स्वरूपाचे पुतळे उभारून आपण जिजामाता व शिवरायांचे कर्तुत्व नाकारत आहोत का?
ज्या शिवरायांनी मंगठीच्या झोरावर स्वराज्य निर्माण केले त्याला दैव वादाचे रूप देणे योग्य आहे का?शिवरायांना देवी प्रसन्ना झाली म्हणून ते स्वराज्य निर्माण करू शकले असा प्रचार करणे योग्य आहे का?
ज्या प्रकारे राम आणि कृष्ण ह्यांना विष्णूचा अवतार घोषित करून त्यांचा वापर दान आणि दक्षिणा मिळवण्यासाठी भटांनी केला तसाच प्रकारे मराठा साम्राज्याचा बाबतीत भाकड कथा रचणे योग्य का?छत्रपती शिवाजी महाराजांना भवानी मातेने स्वतः प्रगट होऊन तलवार दिली होती आणि त्याच तलवारीला भवानी तलवार म्हणतात असा अपप्रचार देशभरात करण्यात आलेला आहे.काही इतिहास्कारांनीच असा अपप्रचार केलेला आहे.छ.शिवाजी महाराजांचे कर्तुत्व लोकांपर्यंत पोहोचूनही अशा या अपप्रचाराने कर्तुत्वप्रधान महाराष्ट्रिय समाज दैववादी बनून बसला आणि महाराजांना भवानी मातेचा आशीर्वाद होता म्हणूनच ते इतके पराक्रम करू शकले आणि संकटातून नेहमी वाचत राहिले असाच विचार समाजमनात पेरला गेला.चांगल्या नशिबाशिवाय काहीच करता येत नाही असे लोक समजू लागले.या इतिहासकारांनी असा प्रचार का केला हे त्यांनाच माहित असेल.त्यांनी असे चुकून केले असे समजायला आपण काही मूर्ख नाही कारण सावंतवाडी जवळील कुडाळ नावाच्या गावातून एका पोर्तुगीज व्यापाऱ्याकडून ३०० होण (१०५० रुपये) रोख देऊन ही तलवार विकत घेतल्याची नोंद महाराजांनी त्यांच्या दफ्तरात(accounts मध्ये) करून ठेवलेली आहे.महाराज केलेला प्रत्येक खर्च दफ्तरात लिहित असत कारण हिशोबात पक्के असण्याचा महाराजांचा कटाक्ष होता.५ मार्च १६५९ ला ही तलवार विकत घेतल्याचे येथे नमूद केले आहे.असे असूनही या इतिहासकारांनी असल्या प्रकारचा अपप्रचार का केला असावा हे समजण्याइतके आपण सर्व सुध्न्य आहात.पुन्हा जर कुणी छ.शिवरायांच्या तलवारीच्या बाबतीत असा अपप्रचार केला तर आपण कुणीही या भूलथापांना बळी पडू नये.आपल्या कर्तुत्वावर विश्वास ठेऊन पुढील जीवन जगण्याचा मनोनिग्रह करूया.
..................छ.शिवाजी महाराज की जय.............




माझ्या राजाला दगडाच्या,
मंदिराची गरज नाही..
माझ्या राजाला रोज,
पुजाव लागत नाही..
माझ्या राजाला दुध-तुपाचा,
अभिषेक करावा लागत नाही..
माझ्या राजाला कधी,
नवस बोलावा लागत नाही..
माझ्या राजाला सोने-चांदीचा,
साज ही चढवावा लागत नाही..
एवढ असुनही जे जगातील,
अब्जवधी लोकांच्या..
हृदयावर अधिराज्य,
गाजवतात असे एकमेव राजे

दुनिया के किसी भी क्रिस्चियन से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् और धर्मग्रन्थ कौन सा है तो वोह बोलेगा की मैं क्रिस्चियन हूँ, बाइबिल भगवान् की किताब है और येशु क्राइस्ट भगवान् के बेटे हमारे लिए सबसे पूजनीय है।
दुनिया के किसी भी मुसलमान से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् और धर्मग्रन्थ कौन सा है तो वोह बोलेगा की मैं मुसलमान हूँ और अल्लाह के सिवाय कोई भगवान् नहीं है और मुहम्मद पैगम्बर साहब उनके आखरी रसूल है (لا اله الا الله محمد رسول الله ) और कुरान हमारी सबसे पवित्र किताब है ।

दुनिया के किसी भी सिख से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है तो वोह बोलेगा की गुरु ग्रन्थ साहब हमारे सबसे बड़े भगवान् है, सिखों के दस गुरुओं पे विश्वास करते है और मानते है की भगवान् एक है ।

दुनिया के किसी भी बुद्धिस्ट से पूछो की तुम्हारा भगवान् कौन है तो वोह बोलेगा की वोह भगवान् से ज्यादा मानवता को महत्व देते है और मानवता की राह बताने वाले तथागत भगवान् बुद्ध को अपना आदर्श मानते है और त्रिपिटक उनके लिए सबसे पवित्र है ।
(Special Note/:विशेष सूचना:- पाली भाषा में भगवान् का अर्थ इश्वर (GOD) नहीं होता है।
पाली भाषा में भगवान् का अर्थ है - "जिस किसी भी व्यक्ति ने उसका सभी अज्ञान, लालसा, कामुकता को जड़ से उखाड़ फ़ेंक दिया है ऐसे व्यक्ति को भगवान् कहा गया है ।)

दुनिया के किसी भी नास्तिक से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है? तो वो बोलेगा की वोह भगवान्को नहीं मानते और ना ही कीसी किताब को, वोह तो सिर्फ मानवता को ही मानते है और तर्क पे विश्वास करते है ।

इन सभी लोगों से आपको साफ़ साफ़ जवाब मिलेगा और वोह भी बिना किसी भ्रम (Confusion) के।

अब हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है और तुम्हारा धर्म ग्रन्थ कौन सा है तो आपको ये उत्तर मिलेगा:

अगर महाराष्ट्र के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है, तो वे कहेंगे - गणेश
अगर दिल्ली के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - राम
अगर गुजरात के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - कृष्ण
अगर बंगाल के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - माँ दुर्गा
अगर बिहार के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - शंकर
अगर दक्षिण भारत के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - मुरुगन/ बालाजी
अगर नेपाल के हिन्दुओं से पूछो की तुम्हारा सबसे बड़ा भगवान् कौन है , तो वे कहेंगे - पशुपति नाथ

धर्म ग्रन्थ के बारे में पूछोगे तो कोई कहेगा भगवद्गीता, कोई कहेगा रामायण, कोई कहेगा महाभारत, कोई कहेगा वेद, कोई कहेगा उपनिषद्, कोई कहेगा श्रुति, और कोई कहेगा उसको पता नहीं!

आपको साफ़ साफ़ जवाब नहीं मिलेगा और भ्रमित (Confused) हो जाओंगे!

अस्सल में हिन्दू नाम का कोई धर्म ही नहीं है, अगर आप विश्लेषण करें तो हिन्दू ये शब्द मुसलमान राजाओं ने गुलाम बनाये हुए, पकडे हुए, बंदी बनाये हुए उच्च जाती के लोगों को हिन्दू कहा था। हिन्दू का अर्थ सिर्फ और सिर्फ गैर मुस्लिम (Non Muslim) होता है और कुछ नहीं। हिन्दू ये शब्द जो खुद को हिन्दू कहते है और हिन्दू होने पर गर्व करते है उनके किसी भी धर्म ग्रन्थ में नहीं है,न ही वेद में है, ना ही पुरानों में है और ना ही भागवाद गीता में है! इससे ये साबित होता है की हिन्दू ये धार्मिक शब्द नहीं है। तो फिर लोग "हिन्दू, हिन्दू हिन्दू" क्यों चिल्लाते रहते है? अस्सल में हिन्दू नाम का कोई धर्म नहीं है ये तो सिर्फ एक गाली है मुसलमान राजाओं ने दी हुयी! हिन्दू धर्म जिसको कहते है उसका असली नाम है वैदिक धर्म, या सनातन धर्म या फिर ब्राह्मणी धर्म और ये धर्म जाती व्यवस्था (Caste System),छुआ-छूत ( Untouchability) , और मानवता की उच्च निच्चता (lower caste-higher caste) पे आधारित है और इसको सनातन (Eternal) कह गया है, सनातन यानी की कभी ना बदलनेवाला! इसमें सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोगों का ही भला है जिनकी संख्या इस देश के 15% है। फिर ये सभी सनातनी लोग " हिन्दू, हिन्दू, हिन्दू" क्यों चिल्लाते रहते है? वोह इसलिए चिल्लाते रहते है, क्यों की सनातनी धर्म या फिर ब्राहमनी धर्म का नारा लगाया जाय तो कोई भी पिछड़ी जात का, शुद्र जात का, या फिर अनुसूचित जाती/जनजाति का आदमी मुर्ख नहीं बनेगा और ब्राह्मण जो हिन्दू नाम पर लोगों को मुर्ख बनाते आ रहे है उनकी असलीयत, उनकी असली औकात सामने आ जाएगी। जैसे ही उनकी असलियत सामने आएगी वैसे ही ब्राह्मण और उनके पालतू कुत्ते, कुत्ते की मौत मारे जायेंगे!!! हिन्दू ये कोई धर्म नहीं है ये तो एक षड़यंत्र है पिछड़ी जात और अन्य जात के लोगों को मुर्ख बनाने का और उनको दुसरे समुदायों के खिलाफ भड़काने का!


अगर आपको हमारी बात पे जरा भी संदेह है तो आप ऊपर लिखी हुयी सभी बातों की स्वयं पुष्टि कर सकते है।

तुम्ही मराठे असाल, परंतु तुमची जात कोणती?
( खासा मराठा म्हणविणारा )

कुणबी, माळी, मांग, महार या जातींचा उल्लेख महात्मा ज्योतिराव फुले एकत्रितपणे करतात, हे आपण आधीच्या भागात पाहिले. फुल्यांच्या संपूर्ण वाङ्मयात असे उल्लेख ठिकठिकाणी येतात. ‘ब्राह्मणांचे कसब' हा ग्रंथ फुले यांनी या जातींनाच अर्पण केला आहे. अर्पण पत्रिकेत फुले म्हणतात, ‘महाराष्ट्र देशांतील कुणबी, माळी, मांग, महार यांस हे पुस्तक ग्रंथकत्र्याने परम प्रीतीने नजर केले असे'. यावरून फुले यांची या जातींविषयी असलेली तळमळ दिसून येते.
असो. या भागात आपण मराठा-कुणबी हे एक असल्याविषयीचा महात्मा फुले यांचा अधिक स्पष्टपणे समोर येणारा अभिप्राय पाहणार आहोत. फुले यांचे ‘शेतकरयाचा असूड' हे पुस्तक जगप्रसिद्ध आहे. हे पुस्तक लिहित असताना फुले यांची अनेकांशी चर्चा झाली. त्यातील दोन गृहस्थांसोबत झालेल्या चर्चेचा तपशील ज्योतिरावांनी पुस्तकाच्या शेवटी परिशिष्टात दिला आहे. त्यातील पहिल्या परिशिष्टाचे शीर्षक आहे ‘खासा मराठा म्हणविणाराङ्क. हे शीर्षकच अन्वयर्थक आहे. फुले यांची लेखनकामाठी सुरू असताना एक गृहस्थ त्यांच्या घरी येतात. गृहस्थांसोबत झालेला चर्चेचा तपशील फुले यांनी या परिशिष्टात दिला आहे. त्यातील काही अंश पुढे देत आहे-

‘‘त्यांनी (फुले यांच्याकडे आलेल्या गृहस्थाने) आपला मोहरा मजकडे फिरवून , आपणहूनच मला प्रश्न केला की, तुम्ही मला ओळखले नाही काय?''
मी म्हणालो, ‘‘नाही महाराज, मी तुम्हाला ओळखले नाही. माफ करा.''
गृहस्थ म्हणाला, ‘‘मी मराठी कुळातील मराठी आहे.''
मी - तुम्ही मराठे असाल, परंतु तुमची जात कोणती?''
गृ. - ‘‘माझी जात मराठे''
मी - ‘‘महाराष्ट्रात जेवढे म्हणून महारापासून तो ब्राह्मणापर्यंत लोक आहेत, त्या सर्वांसच मराठे म्हणतात. तरी तुम्ही अमुक जातीचे आहात याचा उलगडा तेवढ्याने होत नाही.''
गृ. - ‘‘तर मी कुणबी आहे असे समजा.''


महात्मा फुले यांनी दिलेला हा संवाद इतका स्पष्ट आहे की, मराठा आणि कुणबी या जाती एकच आहेत, हे सांगण्यासाठी आणखी वेगळा पुरावा देण्याची गरजच राहिलेली नाही. ‘‘महाराष्ट्रात जेवढे म्हणून महारापासून तो ब्राह्मणापर्यंत लोक आहेत, त्या सर्वांसच मराठे म्हणतात.ङ्कङ्क हे महात्मा फुले यांचे वाक्य ऐतिहासिक सत्य आहे. महाराष्ट्रातील फौज कोणाच्याही नेतृत्वाखाली लढली, तरी तिला मराठा फौज असेच म्हटले जात असे. कुळवाडी भूषण छत्रपती शिवाजी महाराजांनी स्थापन केलेल्या स्वराज्यातील प्रत्येक शिपाई हा मराठा म्हणूनच ओळखला जात होता. पेशवाईच्या काळात मराठे पाणिपतावर लढले. तेव्हा या फौजेला कोणी पेशव्यांची फौज म्हटले नाही. तिला मराठ्यांची फौज असेच म्हटले गेले. आजही महाराष्ट्राबाहेर मराठी लोकांना मराठे असेच म्हटले जाते. त्यामुळे मराठ्यांची खरी जात कुणबी हीच आहे, हे सिद्ध होते.

Proof :-
महात्मा फुले यांच्या ‘शेतकèयाचा असूड' या ग्रंथातील मराठा-कुणबी याविषयीचे विवेचन करणाèया परिशिष्टाच्या पानाची फोटो कॉपी खाली देत आहे. जिज्ञासूंनी ती अवश्य वाचावी

रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव (बाबा रामदेव की संपत्ति 1100 करोड़ रू.आंकी)
इक्कीसवीं सदी में स्वयंभू योग गुरू बनकर उभरे रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेवबाबा रामदेव की संपत्ति 1100 करोड़ रू.आंकी ने बीमारियों के सटीक इलाज के लिए योग को ही सर्वोपरि बताते हैं। आरंभ में तो लोग इनकी ओर आकर्षित नहीं हुए किन्तु कालांतर में कुछ चुनिंदा धार्मिक चैनल्स के स्लाट खरीदकर बाबा रामदेव ने लोगों को इसका आदी बना दिया। इसके बाद रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव का जादू सर चढ़कर बोलने लगा। लेकिन योग के इस विस्तार की आड़ में बाबा रामदेव ने दवाओं का लंबा चौड़ा कारोबार खड़ा कर लिया है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि छोटे से जिले में बाबा रामदेव की दवाओं की फ्रेंचाईजी लेने के लिए आठ लाख रूपयों की दवाएं एक साथ खरीदनी होती है, जिसमें आठ से बारह फीसदी ही कमीशन मिलता है।
रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव को जैसे ही लोकप्रियता मिलना आरंभ हुई उन्होंने कसम खाई कि जब तक देश के हर आदमी को वे निरोग न कर देगे तब तक देश की धरा के बाहर कदम न रखेंगे। बाबा को उनके अनुयाईयों ने समझाया कि आखिर क्या कह गए बाबा। न कभी ऐसा वक्त आएगा और न ही बाबा विदेशी वादियों की सैर कर पाएंगे। फिर अचानक बाबा ने विदेश की ओर रूख कर लिया। इसके बाद बाबा के लग्गू भग्गुओं ने उन्हें राजनीति का ककहरा पढ़ाना आरंभ किया। बाबा ने सियासतदारों की कालर ही खीचना आरंभ कर दिया। बाबा ने एक और बयान सियासी हवा में उछाला कि विदेशों में जमा काले धन को भारत लाने वे सड़कों पर उतरेंगे। समय बीतता गया और दो साल पूरे होने को हैं, देश की सड़कें आज भी रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव का इंतजार कर रही हैं।
रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के इस कदम से कांग्रेस में बौखलाहट बढ़ गई है। इसका कारण यह है कि वर्तमान में काला धन ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के लिए गले की फांस बना हुआ है। कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य एवं महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया है, अब तय मान लीजिए कि बाबा रामदेव की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे आना सुनिश्चित ही है। दिग्गी राजा ने बाबा रामदेव से पूछा है कि वे पता कर लें कि कहीं उन्हें चंदा देने वाले ने तो काला धन उन्हें नहीं दिया है।
उधर रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने दिग्गी राजा के आरोपों के बाद तलवार पजाते हुए कहा है कि उन्होंने अपने ट्रस्ट को मिलने वाले धन का हिसाब आना पाई से सरकार को दे दिया है अब समय है कांग्रेस का कांग्रेस को चाहिए कि वह भी अपने से जुड़े सारे ट्रस्ट के हिसाब किताब को सरकार को दे दे। राजा दिग्विजय सिंह के तीर कहां जाकर किसे और कितने समय बाद घायल करते हैं इस बात के बारे में इस नश्वर दुनिया में सिर्फ और सिर्फ एक ही आदमी जानता है और वह है खुदा राजा दिग्विजय सिंह। गौरतलब होगा कि 2008 में रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने खुद ही स्वीकार किया था कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ रूपयों का होने वाला है। बाबा रामदेव ने स्वीकारा था कि पतांजली योग के साम्राज्य में अप्रत्याशित तौर पर बढोत्तरी दर्ज की गई थी। इसकी शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाईलेण्ड, नेपाल, उत्तर और दक्षिण अफ्रीका, दुबई आदि में खुल चुकीं हैं।
उत्तराखण्ड में कनखल के दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट से आरंभ हुई रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव की छोटी सी दुकान आज लाखों करोड़ रूपयों की हो चुकी है। गौरतलब है कि 2003 में बाबा रामदेव और उनके सखा आचार्य बाल कृष्ण इसी ट्रस्ट के तीन कमरों में मरीजों का उपचार किया करते थे। यक्ष प्रश्न तो यह है कि रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के हाथों में आखिर कौन सा जादुई जिन्न आ गया जिसे रगड़कर महज आठ सालों में ही उन्होंने कई सौ करोड़ का साम्राज्य स्थापित कर लिया है?
वर्तमान मे रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के पतंजलि योग ग्राम का रकबा दस बीस बीघा नहीं वरन आठ सौ बीघा है, जहां हर प्रकार की सुविधाओं के साथ फाईव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर शोभायमान है। इतना ही नहीं यहां अत्याधुनिक शहर की स्थापना भी की गई है। इसके कनखल में ही अलावा सर्वप्रिय विहार कालोनी में तीन बड़ी अट्टालिकाएं हैं, जिनमें इनके रिश्तेदार निवास करते हैं और गोदामों की जगह भी यहीं बनाई गई है।
धंधे में रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने अपने परिवार के लोगों को ही प्रशासनिक पदों पर बिठा रखा है अपने साम्राज्य में। कनखल में दिव्य योग ट्रस्ट मंदिर में दस बीघे में बाबा के भाई रामभरत का प्रशासनिक कार्यालय और गोदाम स्थापित है। इसके अलावा पतंजलि की अन्य इकाईयों में पतंजली आयुर्वेद लिमिटेड का साम्राज्य हरिद्वार में फैला हुआ है। यहां हरिद्वार के पुराने औद्योगिक क्षेत्र में बी 38 और ए 1 में दो कारखाने हैं जिनमें ढाई सौ से ज्यादा आयुर्वेदिक उत्पाद बनाए जाते हैं। इन दोनों का सालाना कारोबार कितने अरब का है पता नहीं। इसके अलावा पतंजलि फूड और हर्बल पार्क के लिए रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने यहीं पचास एकड़ का रकबा खरीद रखा है। इसमें दस इकाईयां अभी चालू हैं बाकी आरंभ होने की बाट जोह रहीं हैं। कहते हैं इस पूरी इकाई का प्रारंभिक निवेश ढाई सौ करोड़ रूपयों से ज्यादा है।
गायों के लिए रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने पतंजलि गोशाला की स्थापना भी की है। बाबा के गायों के बेड़े में पांच सौ से भी अधिक गायें शोभा बढ़ा रही हैं, जिनमें से विदेशी नस्लों की गायों की तादाद बहुतायत में बताई जाती है। बाबा ने गायांे के लिए सैकड़ों बीघा जमीन रख छोड़ी है। बाबा की संपत्ति में हिमाचल प्रदेश के सोलन का नाम भी जुड़ जाता है। कहते हैं रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने पिछले साल स्काटलैण्ड में एक द्व़ीप भी खरीद लिया है।
पतंजली नर्सरी और कारखाने की स्थापना दिल्ली राजमार्ग पर दो सौ बीघा जमीन में की गई है। यहां औषधीय पुष्पों और पौधों की खेती की जाती है। यहां नर्सरी के साथ ही साथ च्यवनप्राश और साबुन बनाने का कारखाना स्थापति है। दिल्ली राजमार्ग पर ही रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने पतंजली योगपीठ चरण एक में अत्याधुनिक चिकित्सालय, विशाल देखने योग्य भव्य भवन और पतंजली विश्विद्यालय की प्रस्तावना देखते ही बनती है। यह पूरा इलाका डेढ़ सौ एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। इसी के दूसरे चरण में साढ़े चार सौ एकड़ भूमि को आरक्षित रखा गया है। इसमें दस हजार लोगो को एक साठ ठहराने और योग करने की अत्याधुनिक सुविधा की व्यवस्था की गई है। यहां भवन देखते ही बनता है और तो और अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र भी यहां पर है।
रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव अब घिरते नजर आ रहे हैं। धर्मार्थ काम की आड़ में बाबा रामदेव ने जो झाड़ काटे हैं वे अब कांग्रेस की नजरों में गड़ने लगे हैं। कल तक मलाई खाने वाले बाबा को अब कांग्रेस के प्रबंधक जमीन चटवाकर ही मानेंगे, क्योंकि बाबा ने काले धन की बात को फैलाकर उसकी दुखती रग पर हाथ रख ही दिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान के बाद अब आयकर विभाग ने भी अपनी नजरें तिरछी करना आरंभ कर दिया है। यह सच है कि रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव आयकर विवरणिका दाखिल करते हैं किन्तु धर्मार्थ संस्था को दर्शाकर बाबा करोड़ों रूपयों के आयकर जमा करने से खुद को बचाते फिर रहे हैं। गौरतलब होगा कि रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के शिविर में शामिल होने और आर्युवेदिक दवाओं को खरीदने के लिए आम आदमी को खासी रकम चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव की संस्था विदेशों से भी मोटा चंदा काट रही है।
लोगों की धारणा बन चुकी है कि रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव अब गरीबों के लिए काम करने के बजाए राजवैद्य बन चुके हैं जिनके पास पहुंचना गरीब गुरबों के बस की बात नहीं रही। बाबा अब अमीरों के हाथों का खिलौना बन चुके हैं। वैसे भी किसी धर्मार्थ संस्था के सर्वेसर्वा का महज आठ सालों में जीरो से हीरो बनना और जनसेवा का काम करने वाली संस्था के पास इतनी कम अवधि में लाखों करोड़ रूपयों की संपत्ति का होना अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं माना जा सकता है। वैसे भी रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव का विवादों से बड़ा पुराना और गहरा नाता है। बाबा ने 2003 में अपना काम आरंभ किया और 2005 में ही दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के मातहत कर्मचारियों में से 113 कर्मचारियों ने न्यूनतम मजदूरी मिलने का मामला सार्वजनिक किया था।इसके बाद 2006 में वाम नेता सीपीआईएम की वृंदा करात ने रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के उपर यह आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी कि दिव्य योग मंदिर में बनने वाली दवाओं में मनुष्य और जनवरों की हड्डियों का प्रयोग किया जाता है। बाद में उत्ताखण्ड सरकार की क्लीन चिट के बाद मामला शांत हो पाया था।
रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने न्यायालयों को भी आड़े हाथों लेने से गुरेज नहीं किया। जुलाई 2009 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक सेक्स को जायज ठहराया था तब बाबा ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया था। बाबा ने चुनिंदा ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक्स के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर अभियान छेड़ रखा है। इतना ही नहीं बाबा के द्वारा कैंसर और एड्स जैसी बीमारी के योग से इलाज के मामले में भी बाबा पर सवाल उठे, जिनका जवाब बाबा ने आज तक नहीं दिया है। अब उंट पहाड़ के नीचे आ चुका है। बाबा रामदेव अब सियासी गोदे (अखाड़े) में उतरे हैं। बाबा को सपने में उम्मीद नहीं होगी कि उनकी पहली भिडंत ही दिग्विजय सिंह जैसे घाघ पहलवान से हो जाएगी। या तो बाबा चारों खाने चित्त मिलेंगे या फिर दस जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) में पूंछ हिलाते नजर आएंगे।

धंधे में रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने अपने परिवार के लोगों को ही प्रशासनिक पदों पर बिठा रखा है अपने साम्राज्य में। कनखल में दिव्य योग ट्रस्ट मंदिर में दस बीघे में बाबा के भाई रामभरत का प्रशासनिक कार्यालय और गोदाम स्थापित है। इसके अलावा पतंजलि की अन्य इकाईयों में पतंजली आयुर्वेद लिमिटेड का साम्राज्य हरिद्वार में फैला हुआ है। यहां हरिद्वार के पुराने औद्योगिक क्षेत्र में बी 38 और ए 1 में दो कारखाने हैं जिनमें ढाई सौ से ज्यादा आयुर्वेदिक उत्पाद बनाए जाते हैं। इन दोनों का सालाना कारोबार कितने अरब का है पता नहीं। इसके अलावा पतंजलि फूड और हर्बल पार्क के लिए रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने यहीं पचास एकड़ का रकबा खरीद रखा है। इसमें दस इकाईयां अभी चालू हैं बाकी आरंभ होने की बाट जोह रहीं हैं। कहते हैं इस पूरी इकाई का प्रारंभिक निवेश ढाई सौ करोड़ रूपयों से ज्यादा है।


देवाला पुजणाऱ्या महिला,
देवदासी झाल्या...
खंडोबाला पुजणाऱ्या महिला,
मुरळ्या झाल्या...
विठ्ठलाला पुजणाऱ्या महिला,
वारकरी झाल्या...
आसाराम बापुला पुजणाऱ्या महिला,
आज बर्बाद झाल्या...
पण माझ्या "बाबासाहेबांना" पुजणाऱ्या महिला,
"बाबासाहेबांना" वंदन करणाऱ्या महिला,
"बाबासाहेबांचा" अभ्यास करणाऱ्या महिला,
शिक्षिका झाल्या,
मुख्याध्यापिका झाल्या, पोलिस झाल्या,
सदस्य झाल्या, सरपंच झाल्या,
ग्रामसेविका झाल्या,
नगरसेविका झाल्या, नगराध्यक्ष झाल्या,
महापौर झाल्या,
कलेक्टर झाल्या, मंञी झाल्या,
मुख्यमंत्री झाल्या,
प्रधानमंत्री झाल्या आणि राष्ट्रपती झाल्या.

Thursday, 31 May 2018

*दुनिया में बौद्ध आबादी या जनसंख्या के बारें महत्त्वपूर्ण जानकारी... जरूर पढे..*



आज दुनिया के अलग अलग देशों में बौद्ध जनसंख्या के सटीक आंकडे उपलब्ध है।
यह जानकारी उपयुक्त सभी संबधित अलग अलग देशों में किये गये Studies और Investigation पर आधारित हैं।
जिसमें लोगों ने कबूल किया, कि उनका बौद्ध धर्म पर पूरा विश्वास है, और वह उसकी Practice करते हैं। वो अपने आप को #Buddhist घोषित करते हैं।

इन अध्ययनों के नतीजे वर्ष 2010-2013 के मध्य में प्रकाशित हुए थे।
(www.thedhamma.com/buddhist_in_the_world.htm 2010;)
("China Beliefs"
Justchina.org.,2011;)
("China Culture Exploring Assistant",
China business
Interpreter.com,2011)
(CIA The World Fact book: Populations as
of July 2013)
(The Dhamma Encyclopedia-
Buddhism in the World).

यह Estimates संबंधित अलग-अलग देशों में बौद्ध जनसंख्या की सच्ची स्थिति को दर्शाते है।

July 2010 में बौद्ध जनसंख्या का Estimated 1.6 से 1.8 billion लगभग (160 - 180 करोड़) के करीब था।

दुनिया की जनसंख्या का 22% से 25% हिस्सा है। इसे स्वतंत्र Estimate के तौर पर सुचित किया गया है।

स्वतंत्र Estimate अनुसार चीन की वर्तमान जनसंख्या में Over One Billion (1,070,893,447) [ 107 करोड़ से भी ज्यादा ] बौद्ध अनुयायीओ की जनसंख्या है। एक और सर्वेक्षण के अनुसार चीन की 91% आबादी (122 करोड) बौद्ध है..यह दुनिया की बौद्ध आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा है। यह बात उपर दिये गये संदर्भो से प्रमाणित होती है।

इसके अलावा
(China's Buddhist population in U.S State Department Report on China) ,
(Global Center for the Study of Contemporary China) ,
(China Daily)
और (a report by Christian missionaries in China).
इन स्त्रोतों से पता चलता है, कि इनके द्वारा किये गए निरीक्षण में चीन के 80% से 91% लोगों ने अपनी पहचान Buddhism के साथ जोडी हैं।
तथा उसकी परंपरा पर पुरा विश्वास प्रकट किया है। और हाल ही में हुए कुछ अध्ययन दर्शाते है, कि चीन के 98% लोग खुद को Buddhist मानते है।

भारत में जनगणना के अनुसार 1% से कम बौद्ध है लेकिन बौद्ध विद्वान, और अन्य सर्वेक्षण के अनूसार भारत में कुल 3% से 5% बौद्ध जनसंख्या है, 1959 में एक सर्वेक्षण के अनुसार तब भारत में करीब 2 करोड बौद्ध आबादी थी जो भारत की आबादी का 4.5% हिस्सा था, तब से लेकर आजतक इन 50-60 सालों मे भारत के हर साल लाखो लोग बौद्ध धर्म का स्विकार किया है इसलिए बौद्ध आबादी 0.5% से 1% बढ गई होगी, मतलब की भारत में आज 5 से 5.5% (6.6 करोड) बौद्ध जनसंख्या है।

पर साथ ही साथ चीन की अनेक अध्यात्मिक परंपरा पर भी विश्वास जताया।
(www.thedhamma.com/buddhist_in_the_world.htm, The Dhamma Encyclopedia, Definition of a Buddhist by David N.Snyder).

#Buddhist_Population Of Selected Countries
{ 1 Million = 10 लाख } {1 Billion = 1अरब}

चीन 1.07 - 1.22 Billion (80% - 91%)
जापान 122 million (96%)
वियतनाम 74 million (85%)
थायलँड 64 million (95%)
भारत 61- 66 million (5%- 5.5%)
म्यांमार 49.7 million (90%)
दक्षिण कोरिया 24.5 (54%)
तायवान 21.7 million (93%)
श्रीलंका 16.1 million (70%)
कंबोडिया 14.7 million (97%)
हाँगकाँग 6.4 million (90%)
मलेशिया 6.2 million (21%)
अमेरिका 6 million (02%)
लाओस 5 - 8 million (67%- 98%)
इंडोनेशिया 4.3 million (01.7%)
उत्तरी कोरिया 3.4- 17.6 million (14%-71%)
नेपाल 3.3 - 6 million (11.5% -21%)
मंगोलिया 3 million (93%- 98%)
सिंगापुर 2.8 - 3.7 million (51% - 67%)
फिलीपीन्स 2 million (01.5%)
रशिया 2 million (01.4%)
कॅनडा 1.2 million (03.5%)
बांग्लादेश 1.1million (00.7%)
फ्रांस 1million (01.5%)
ब्राजील 1million (0.5%)
जर्मनी 905,657 (01%)
इंग्लैंड 760,747 (01%)
भुटान 609,249 (84%- 94%)
ब्रुनेई 58,498 (17%)
(Near Malaysia)
मकाउ 466,402 (75%- 90%)*
सिक्किम 171,000 (28%- 30%)**
लद्दाख 125,000 (45%)***
ऑस्ट्रेलिया 528,977 (2.5%) (2011)
स्पेन (300,000)
नेदरलँड (201,660)
इटली (122,965)
मॅक्सीको (108,700)
कोस्टारिका (96,733)
पेरू (89,500)
उज्बेकिस्तान (85,985)
स्विझरलँड (79,960)
टर्की (71,159)
पनामा (68,000)
वेनेजुएला (56,000)
अर्जेंटिना (42,600)
ओमान (32,049)
चिली (17,200)
सौदीअरब 414,016 (1.5%)
कुवैत 100,222 (4%)
न्यूझीलँड 58,404 (1.50%)
कतर 45,361 (5%)
यु.ए.ई (5%)
बहरीन (2%)
लेबनान (2.1%)
बर्नोयस (16.8%)
नॉर्थ मारियन (15.6%)
नौरू (11.9%)
गूआम (3.8%)
फ्रेंच गूयाना (3.6%)
मॉरेशियस (2.1%)
क्रिसमस आईसलँड 1,554 (75%)
(Territory of Australia)

इस सर्वेक्षण के अनुसार, पूरी दुनिया में आज करीब 1.8 अरब (180 करोड़) बौद्ध अनुयायी फैले हुए है...जो विश्व आबादी का 25% हिस्सा है।

चीन में 2.5 लाख से ज्यादा भिक्खू और भिक्खूनीया है। 28,000 से अधिक बौद्ध मठ (monasteries) है, 16,000 से ज्यादा बौद्ध विहार है। बौद्ध वास्तूकला की अमिट छाप चीन पर दिखाई देती है। चीन ने अधिकारिक तौर पर कहा है, कि बौद्ध धम्म चीन अभिन्न अंग है।
हाल ही में 16 से 18 ऑक्टोंबर 2014 को चीन में हुई, 27th वी World Fellowship Of Buddhist (WFB) विश्व बौध्द भातृसंघ की आंतरराष्ट्रीय षरिषद हुई। जीसका मुख्यालय थायलँड मैं है, इसके 35 देशों में 140 रिजनल सेंटरस् हैं।
इस (WFB) की षरिषद में 40 देशों के 600 प्रतिनिधि शामिल हुए थे। जिसमें सारे प्रतिनिधीयों ने एकमत से प्रस्ताव पारित किया कि, सारे बौद्ध देश आपस में मजबूत सहबंध, एकता और भाईचारा बनाएंगे। तथा सब विश्व शांति,मानवी कल्याण और समाज सेवा के लिए बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करेगें। चीन ने विश्व में सबसे मजबूत बौद्ध राष्ट्र के नाते जिम्मेदारी ली है, कि वह विश्व में बौद्ध धम्म फैलाने में अगुवाई करेंगा। तथा आंतरराष्ट्रीय तौर पर उसको समर्थन देंगा। बौद्ध धम्म और उसकी मान्यताएं, मूल्यों तथा परंपरा को सुरक्षित करेंगा। इस परिषद में सब देशों ने मिलकर काम करने की, तथा बौद्ध धम्म की धरोहर को संरक्षित करने और उसकी विचारधारा को फैलाने के लिए प्रतिबद्ध होने का वचन दिया। इस परिषद में Buddhist Association Of China (BAC) के अध्यक्ष मास्टर चाउनईन ने कहा, यह परिषद milestone साबित होंगी। (WFB) और (BAC) मिलकर काम करेंगे। तथा चीन आर्थिक रूप से बुद्धिस्ट राष्ट्रों की मदत करेंगा। वहां बुनियादी ढांचे का विकास करेंगा, जैसे वह श्रीलंका में कर रहा है।
Dr.Daya Hewapathirane - Advisor to the President of Srilanka.
-Asia Tribune-

कौन कहता है, भारत विश्व गुरु नही है। वह हजारों सालों से विश्व गुरु रहा है, और आज भी है। बौद्ध धम्म भारत की सच्ची विरासत, सभ्यता और संस्कृति है। जीसे पूरी दुनिया ने स्वीकार किया है। भारत की संस्कृति अब दुनिया की संस्कृति बन गई है। डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर कहते," सत्य भी कभी कभी हार जाता है,यह उसका ही उदाहरण है।
पर सत्य ज्यादा देर तक छुपाया नही जा सकता,
भारत में बौद्ध धम्म की ऐसी लह़र आयेंगी की उसमे सब बह जाएंगे। जो उसके विपरीत जाएगा वो भी उसमें बह जाएंगा"।
भारत एक बार फिर बौद्धमय होंगा, जैसे सम्राट अशोक के समय 90% लोग बौद्ध थे। और आगे कुछ समय बाद पुरी दुनिया की आधी से जादा आबादी बौद्ध हो गई थी...
अब तो यही कहेंना पडेंगा
"जग में बुद्ध का नाम है, यहीं भारत की शान है"

भारत के बौद्धों को अब अनुसूचित जाती का आरक्षण देने का फैसला हो गया है इसलिए भारत के बौद्ध अनुयायी स्कूल रिकोर्ड में, जनगणना में, सरकारी दफ्तरों में अपने धर्म को " बौद्ध " ही लिखिए और लिखवाइए..

बाबासाहेब ने धर्मांचरण के बाद कहॉ था अगर में दो वर्ष और जी जाऊ तो मैं दो साल के भारत में 5 करोड़ (15%) बौद्ध बनाकर दिखाऊंगा... हम बाबासाहेब के अनुयायी है और आज 60 साल क् बाद भी भारत में 15% बौद्ध नहीं है और 'ऑफिशियल' बौद्ध भी 5 करोड नहीं है..
इसलिए अपने धर्म को बौद्ध लिखिए..
इससे बौद्ध जनसंख्या बढेगी नहीं बल्कि बौद्धों की सही जनसंख्या पता चलेगी.. असम में भारत में बौद्ध धर्म को मानने वालों की आबादी 6.6 करोड से अधिक है जो ख्रिश्चन, शिख, जैन की जनसंख्या से भी अधिक है.. लेकिन बौद्ध लोग जनगणना एवं अन्य रोकॉर्ड में अपने धर्म "बौद्ध धर्म" नहीं लिखवाते.. आज महाराष्ट्र में 1.4 करोड बौद्ध है...

इस msg को इतना फैला दो की भारत में इसकी सुनामी आ जाए

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Monday, 28 May 2018

भगवान विष्णु के अवतार नहीं है बुद्ध!

बौद्ध धर्म कि प्रगति के कारण आर्य ब्राह्मण धर्म विकसित नहीं हो पा  रहा था , कर्मकांड , यज्ञ बली, पुरोहितवाद आदि ब्रह्मणो के आय के मुख्य स्रोत  थे जिस पर बौद्ध राजाओं ने प्रतिबंध लगा दिया था इसलिए आर्य  ब्राह्मण आर्थिक रूप से कमजोर हो गए थे |



आर्य ब्रह्मणो का प्रतिष्टा का दूसरा स्रोत जाती प्रथा थी जिसके सहारे वे अपने को समाज से ऊँचा मानते थे और खुद को देवता तुल्य समझ कर समाज से पुजवाते थे , बौद्ध धर्म जातिवाद का विरोधी था और इसमें सभी सामान थे | जाती नियमो का कोई स्थान नहीं था जैसा कि आर्य ब्रह्मणो में था |



आर्य ब्रह्मणो का तीसरा और महत्वपूर्ण प्रतिष्टा , शक्ति का जो स्रोत था वह थी संस्कृत भाषा , जिस पर बरह्मणो का एकाधिकार था और दूसरी किसी भी  जाती( खास कर शुद्रो के लिए ) के लिए संस्कृत पढ़ना निषेधथा | बुद्ध ने अपने बौद्ध धर्म का प्रचार जनसाधारण कि पाली भाषा में किया और बौद्ध राजाओं के शासनकाल में बौद्ध धर्म ग्रन्थ और साहित्य भी पाली भाषा में ही लिखे गए | अत: बौद्ध धर्म के आने के बाद आर्य ब्रह्मणो के आय और प्रतिष्टा के सारे स्रोत सूख गए थे जिस कारण ब्राह्मण वर्ग  विचलित हो गया था |



परन्तु जब तक सर्वोच्च प्रजातंत्रीय बौद्ध धर्म अपने मूल सिद्धांतो पर बना रहा और इसके शक्तिशाली राजा अपने बौद्ध नियमो पर बने रहे तब तक आर्य ब्रह्मणो के लिए यह सम्भव नहीं था कि वो अपनी तानाशाही फिर से भारतीय समाज पर थोप सके|



बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात् से सन ६५० ई. तक बौद्ध धर्म प्रणियों के कल्याण में लगा रहा परन्तु  अपनी हार से तिलमिलाए आर्य ब्राह्मण इसके पतन के उपाय में निरंतर प्रत्यनशील रहे | इस तरह  सर्वप्रथम क्षति पहुचने प्रयास उन आर्य शासको  ने किया जिन्होने ऊपरी तौर पर बौद्ध धर्म अपना कर उसमें अपने धार्मिक विश्वासो का मिश्रण कर महायान सम्प्रदाय का विकास कर पहुचाई | इन आर्यों  में शक , कुषाण , महायानी आदि विद्वान्  थे जिन्होंने पाली भाषा में लिखे मूल बौद्ध धर्म ग्रंथो का अपनी संस्कृत भाषा में अनुवाद करवाया और उसमें अपनी मन मर्जी से मनमाने आख्यान जोड़ दिए।



बौद्ध धर्म को विघटित कर उस में से महायान सम्प्रदाय उत्पन्न करने वाले ब्राह्मण आचार्यो में प्रमुख थे आचार्य असंग , अश्वघोष आदि जिन्होंने बुद्ध को विष्णु  अवतार घोषित कर उन्हें दिवंगत बौद्ध धर्म गुरु से एक जीवित रक्षक देवता  बना दिया । जिसका  परिणाम यह हुआ कि बौद्ध धर्म में भक्ति के समवेश से उनका रूप ही बदल गया ।



कालांतर में इन विदेशी मूल के आर्य ब्रह्मण विद्वानो ने अपने पुनर्जन्म के सिद्धांत के आधार पर तथागत बुद्ध को फिर से अवतार(  मैत्र्ये) लेने कि घोषणा भी कर दी। उनके  अनीश्वरवाद के सिद्धांत के विपरीत उनके अनगिनत चित्र बना दिए जो ब्रह्मा , विष्णु,,महेश,गणेश आदि देवताओं के समान थे । इन विद्वानो ने बुद्ध के ऐसे ऐसे चित्र  बनाये जिसमें बुद्ध के साथ अनेक ऐश्वर्यशाली वस्तुए दिखाई देती थे , उन के साथ अंगो को प्रकट दिखाने वाली स्त्रियों के भित्ति चित्र बना डाले ।



नाग को अनेक बुद्ध विहारो का रक्षक देवता बना डाला ,इन सबके ऊपर बुद्ध अगम्य स्वर्ग में विराजमान दिखा दिए गए। कई प्राचीन कहानियों को ज्यों का त्यों बुद्ध कि पुनर्जन्म कि कथाओं के रूप ( जातको) में बदल दिया और उनके पार्थिव  के अवशेषो कि पूजा आरम्भ कर दी । फलत: तथागत बुद्ध अधिक अधिक रूप में पृष्ठ भूमि में पड़ते गए । इन आर्य ब्रह्मणो ने दूसरी चाल यह चली कि धीरे धीरे प्राचीन अनुष्ठानो को परिष्कृत कर उन्हें तंत्र विद्या के नाम में मिश्रित कर लिया । अत: महायान का रूप तंत्रयान हो गया , इससे नए सम्प्रदाय अस्तित्व में आये। इन सम्प्रदायों ने वे अन्धविश्वास ,चमत्कार , पुनर्जन्म , आत्मा, ईश्वर , देवता , आदि आडम्बर अपना लिए जिनका बुद्ध जीवन भर विरोध करते रहे ।



महायान मत का उदय ब्रह्मणो द्वारा इसलिए  किया गया ताकि बौद्ध धर्म का मूल सिद्धांत को नष्ट किया  जा सके और इसे ब्राह्मण मत( शैव, वैष्णव आदि) के निकट लाया जा सके । महायनीयों ने बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतो को मानने वालो को हीनयान का नाम दिया । कालांतर में इन्ही महायनीयों ने बुद्ध के विषय में मनमानी जातक कथाये बनाई और भागवत धर्म और शैव धर्म का प्रचार किया ।



बुद्ध के सिद्धांत –

1 – अपना दीपक आप बनो

2-तुम अपना शरण्य आप बनो

3 -अपने निर्वाण का प्रयत्न तुम स्वयं करो

4 – आत्मा , ईश्वर नाम कि कोई वास्तु नहीं है



जबकि महायनीयों ने उल्टा किया –

1- ईश्वर भक्ति को स्थान दिया

2-आत्मा परमात्मा , स्वर्ग आदि पर विश्वास किया

3-बुद्ध कि मूर्ति बना दी और उन्हें अवतार घोषित कर दिया

4 तंत्र  मन्त्र , कर्म कांड पर जोर दिया



मध्यकाल में भी इन सम्प्रदायो ने तर्कसंगत बौद्ध शास्त्राथो को मोड़कर कर्मकांडी चर्चाओं कि ओर कर दिया। कुमारिल भट्ट और उनके शिष्यो ने बौद्ध गुरुओं से शिक्षा ग्रहण कर बौद्ध धर्म विरोधी संस्कृत गर्न्थों कि रचना कि । इसी प्रकार नागार्जुन और बसुबन्ध ने लंकावतार व् माध्यमिक सूक्त कि रचना कर गौतम बुद्ध  के न्याय सूत्रो का खंडन किया और उनके प्रतिउत्तर में वात्सायन मुनि ने न्याय भाष्य कि रचना कि , उनका खंडन दिदनाथ ने किया । उसके प्रतिवाद में उद्धोताचार्य ने  न्याय वर्तिका टीका लिखी ,  प्रकार महायानियो ने बौद्ध धर्म का उपयोग जन कल्याण के बजाय व्यर्थ वाद-विवाद में करना आरम्भ कर दिया । कुमारिल भट्ट ने तर्कपूर्ण बौद्ध शास्त्रो को उलटने के उद्देश्य से ही पूर्व मीमांसा कि रचना कि । ग्रन्थ कि टीका से उसने यह स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य बौद्ध धर्म समाज कि धार्मिक स्वतंत्रता नष्ट करना है । इस ग्रन्थ में कुमारिल भट्ट ने ऐसे सिद्धांत ईजाद किये कि उसका आधार बना के बाद के ब्राह्मण विद्वान् अपने हिसाब से धर्म व्यवस्था करने लगे ।





आर्य ब्रह्मणो  का बौद्ध  धर्म के प्रति द्वेष कितना था इसका मात्र एक उदहारण से आप अंदाजा लगा सकते है । आज किसी को यदि बदसूरत या कुरूप कहना हो तो हम उसको “भद्दा” कह देते हैं । परन्तु क्या आपको पता है कि यह भद्दा शब्द कहा से आया? यह “भद्दा’ शब्द पाली भाषा के ‘भद्द’ शब्द से आया है। पाली भाषा में भद्द का अर्थ होता है ‘सुन्दर’ जो कि बौद्ध भिक्षुओं के सम्मान में उपयोग होता था परन्तु आर्य ब्रह्मणो ने द्वेष वस् भद्द को भद्दा कर दिया और उसका उल्टा और अपमानजनक अर्थ कर दिया । - नवभारत टाईम
December 24, 2013, 6:30